ग़ालिब की ग़ज़ल : ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक

आह को चाहिए इक उम्र, असर होने तक
कौन जीता है तिरी जुल्फ के सर होने तक

दामे हर मौज में है, हल्क़:-ए-सदक़ाम निहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे प' गुहर होने तक


आशिक़ी सब्र तलब और तमन्ना बेताब
दिल का क्या रंग करूँ, ख़न-ए-जिगर होने तक

हमने माना, कि तग़ाफुल न करोगे, लेकिन
ख़ाक हो जाएँगे हम, तुमको ख़बर होने तक... 

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