गजल : छलकते जाम

गोया वो मदहोश होकर मेरी कसमों से यूं मुकर से जाते हैं जब मयकदे में उनके आगे आशि‍की में जाम छलक जात...

जन्नत पुकारती है...

हर शख़्स मेरा साथ निभा नहीं सकता

उसको रुखसत तो किया था, मुझे मालूम न था, सारा घर ले गया, घर छोड़ के जानेवाला - निदा फ़ाज़ली

जान लेने का हक़ नहीं वरना

फ़ैसले सच के हक़ में होते हैं मैं अभी तक इसी गुमान में था---- अशफ़ाक़ अंजुम

दोनों जहान तेरी मुहब्बत में हार के

ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ...

तुम्हारे साथ ये मौसम फ़रिश्तों जैसा है , तुम्हारे बाद ये मौसम बहुत सतायेगा - बशीर बद्र

अशआर : (मजरूह सुलतानपुरी)

जला के मिशअले-जाँ हम जुनूँ सिफ़ात चले जो घर को आग लगाए हमारे सात चले

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया

होगा कोई ऐसा भी जो ग़ालिब को न जाने शाइर तो वो अच्छा है प बदनाम बहुत है

ग़ज़ल में तसव्वुफ़ (भक्ति भाव)

जब यार देखा नयन भर दिल की गई चिंता उतर ऐसा नहीं कोई अजब राखे उसे समझाए कर

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता

हर एक रास्ता मंज़िल है चल सको तो चलो बने बनाए हैं सांचे जो ढल सको तो चलो
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