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हिन्दू धर्म में भगवा रंग ही क्यों, जानिए रहस्य...

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गेरू और भगवा रंग एक ही है, लेकिन केसरिया में मामूली-सा अंतर है। केसरिया को अंग्रेजी में Saffron तो भगवा को Ochre कह सकते हैं। केसरिया में थोड़ा लालपन ज्यादा होता है जबकि भगवा में पीलापन। हिन्दू धर्म में प्रत्येक रंग का अपना अलग महत्व है। हिन्दू ध्वज भगवा और केसरिया दोनों ही रंगों का होता है। नारंगी रंग भी इसी तरह का होता है। रंगों से जुड़े मनोविज्ञान और उसके मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को जानकर ही हिन्दू धर्म में कुछ विशेष रंगों को विशेष कार्यों में शामिल किया गया है। आज हम आपको बताएंगे रंगों के बारे में ऐसी बातें, जो आपने कहीं ओर नहीं पढ़ी होंगी।
 
भगवा रंग का महत्व जानने के पहले यह जानना जरूरी है कि सृष्टि में मूलत: रंग कितने हैं और उनका महत्व क्या है? आपको शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि वैज्ञानिकों के अनुसार कुछ पशु या पक्षियों को सफेद और काले रंग के अलावा अन्य कोई दूसरा रंग नजर नहीं आता। अर्थात उनकी जिंदगी ब्लैक एंड व्हाइट है। हम इंसान खुशनसीब हैं कि हमें सभी रंग नजर आते हैं। 'हम रंभभेद करना जानते हैं!'
 
मूल रंग : वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार रंग तो मूलत: 5 ही होते हैं- काला, सफेद, लाल, नीला और पीला। काले और सफेद को रंग मानना हमारी मजबूरी है जबकि यह कोई रंग नहीं है। इस तरह 3 ही प्रमुख रंग बच जाते हैं- लाल, पीला और नीला। 
जब कोई रंग बहुत फेड हो जाता है तो वह सफेद हो जाता है और जब कोई रंग बहुत डार्क हो जाता है तो वह काला पड़ जाता है। लाल रंग में अगर पीला मिला दिया जाए, तो वह केसरिया रंग बनता है। नीले में पीला मिल जाए, तब हरा रंग बन जाता है। इसी तरह से नीला और लाल मिलकर जामुनी बन जाते हैं। आगे चलकर इन्हीं प्रमुख रंगों से हजारों रंगों की उत्पत्ति हुई।
 
मूल रंगों का रहस्य : आपने आग जलते हुए देखी होगी- उसमें ये 3 ही रंग दिखाई देते हैं। आपको शायद आश्चर्य होगा कि ये तीनों रंग भी जन्म, जीवन और मृत्यु जैसे ही हैं, जैसा कि हम ब्रह्मा, विष्णु और महेश के बारे में कहते हैं। शास्त्र अनुसार हमारे शरीर में स्थित हैं 7 प्रकार के चक्र। ये सातों चक्र हमारे 7 प्रकार के शरीर से जुड़े हुए हैं। 7 शरीर में से प्रमुख हैं 3 शरीर- भौतिक, सूक्ष्म और कारण। भौतिक शरीर लाल रक्त से सना है जिसमें लाल रंग की अधिकता है। सूक्ष्म शरीर सूर्य के पीले प्रकाश की तरह है और कारण शरीर नीला रंग लिए हुए है।
 
उपरोक्त 3 रंगों में से लाल और पीले रंग का हिन्दू धर्म में क्यों चयन किया गया है, इसका भी कारण है। हमने उपरोक्त बताया कि लाल और पीला मिलकर केसरिया बन जाते हैं। यह केसरिया रंग ही हिन्दू धर्म का प्रमुख रंग माना गया है।
 
यह मैटर कॉपीराइट है... 
 
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1. लाल रंग : हिन्दू धर्म में विवाहित महिला लाल रंग की साड़ी और हरी चूड़ियां पहनती है। लाल रंग उत्साह, उमंग और नवजीवन का प्रतीक है। प्रकृति में लाल रंग या उसके ही रंग समूह के फूल अधिक पाए जाते हैं। इसके अलावा विवाह के समय दूल्हा भी लाल या केसरी रंग की पगड़ी ही धारण करता है, जो उसके आने वाले जीवन की खुशहाली से जुड़ी है।
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दरअसल, लाल रंग हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। लाल रंग का उचित रीति से इस्तेमाल किया जाए तो यह आपका भाग्य बदल सकता है और गलत रीति से अधिकता में इस्तेमाल किया जाए तो यह आपको दुस्साहस और क्रोध की अग्नि में धकेल भी सकता है।
 
मां लक्ष्मी को लाल रंग प्रिय है। मां लक्ष्मी लाल वस्त्र पहनती हैं और लाल रंग के कमल पर शोभायमान रहती हैं। रामभक्त हनुमान को भी लाल व सिन्दूरी रंग प्रिय हैं इसलिए भक्तगण उन्हें सिन्दूर अर्पित करते हैं। लाल रंग सौभाग्य का प्रतीक भी है। लाल रंग शारीरिक संचलन का रंग है इसलिए यह हमारी शारीरिक जीवन शक्ति को जगाता है। प्रेम-प्यार के प्रतीक इस रंग को कामुकता का रंग भी कहते हैं। जीवन तो उत्साह से ही चलता है। जीवन में निराशा है तो पतझड़ आ जाएगा अर्थात निराशा के भाव आपको संन्यास या आत्महत्या की ओर ले जाएंगे।
 
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2. पीला रंग : किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य में पीले रंग का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा-पाठ में पीला रंग शुभ माना जाता है। केसरिया या पीला रंग सूर्यदेव, मंगल और बृहस्पति जैसे ग्रहों का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह रोशनी को भी दर्शाता है। पीला रंग वैराग्य का भी प्रतीक है। जब पतझड़ आता है तो पत्ते पीले पड़ जाते हैं। इस तरह पीला रंग बहुत कुछ कहता है।
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वैज्ञानिकों के अनुसार पीला रंग रक्त संचार बढ़ाता है। थकान दूर करता है। पीले रंग के संपर्क में रहने से रक्त कणों के निर्माण की प्रक्रिया बढ़ती है। सूजन, टॉन्सिल, मियादी बुखार, नाड़ी शूल, अपच, उल्टी, पीलिया, खूनी बवासीर, अनिद्रा और काली खांसी का नाश होता है। 
 
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3. नीला रंग : इस ब्रह्मांड में सबसे अधिक नीला और काला रंग ही मौजूद है। निश्चित ही नीले रंग की उपस्थिति हरी-भरी प्रकृति में कम है लेकिन आकाश और समुद्र का रंग नीला होने का कारण है उनकी गहराई। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि आत्मा का रंग भी नीला ही होता है। कुछ ज्ञानीजन मानते हैं कि नीला रंग आज्ञा चक्र एवं आत्मा का रंग है। नीले रंग के प्रकाश के रूप में आत्मा ही दिखाई पड़ती है और पीले रंग का प्रकाश आत्मा की उपस्थिति को सूचित करता है। 
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संपूर्ण जगत में नीले रंग की अधिकता है। धरती पर 75 प्रतिशत फैले जल के कारण नीले रंग का प्रकाश ही फैला हुआ है तभी तो हमें आसमान नीला दिखाई देता है। कहना चाहिए कि कुछ-कुछ आसमानी है आत्मा। शुरुआत में ध्यान करने वालों को ध्यान के दौरान कुछ एक जैसे एवं कुछ अलग प्रकार के अनुभव होते हैं। पहले भौहों के बीच आज्ञा चक्र में ध्यान लगने पर अंधेरा दिखाई देने लगता है। अंधेरे में कहीं नीला और फिर कहीं पीला रंग दिखाई देने लगता है।
 
ये गोलाकार में दिखाई देने वाले रंग हमारे द्वारा देखे गए दृश्य जगत का रिफ्‍लेक्शन भी हो सकते हैं और हमारे शरीर और मन की हलचल से निर्मित ऊर्जा भी। गोले के भीतर गोले चलते रहते हैं, जो कुछ देर दिखाई देने के बाद अदृश्य हो जाते हैं और उसकी जगह वैसा ही दूसरा बड़ा गोला दिखाई देने लगता है। यह क्रम चलता रहता है। जब नीला रंग आपको अच्छे से दिखाई देने लगे तब समझें कि आप स्वयं के करीब पहुंच गए हैं।
 
चक्रों के नाम : मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। मूलाधार चक्र हमारे भौतिक शरीर के गुप्तांग, स्वाधिष्ठान चक्र उससे कुछ ऊपर, मणिपुर चक्र नाभि स्थान में, अनाहत हृदय में, विशुद्धि चक्र कंठ में, आज्ञा चक्र दोनों भौंहों के बीच जिसे भृकुटी कहा जाता है और सहस्रार चक्र हमारे सिर के चोटी वाले स्थान पर स्थित होता है। प्रत्येक चक्र का अपना रंग है।
 
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4. केसरिया या भगवा रंग : केसरिया रंग त्याग, बलिदान, ज्ञान, शुद्धता एवं सेवा का प्रतीक है। शिवाजी की सेना का ध्वज, राम, कृष्ण और अर्जुन के रथों के ध्वज का रंग केसरिया ही था। चित्त क्षोम और रात्रि अंधता में इस रंग का प्रयोग करना चाहिए। केसरिया या भगवा रंग शौर्य, बलिदान और वीरता का प्रतीक भी है। भगवा या केसरिया सूर्योदय और सूर्यास्त का रंग भी है, मतलब हिन्दू की चिरंतन, सनातनी, पुनर्जन्म की धारणाओं को बताने वाला रंग है यह।
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अग्नि का रंग : अग्नि में आपको लाल, पीला और केसरिया रंग ही अधिक दिखाई देगा। हिन्दू धर्म में अग्नि का बहुत महत्व है। यज्ञ, दीपक और दाह-संस्कार अग्नि के ही कार्य हैं। अग्नि का संबंध पवित्र यज्ञों से भी है इसलिए भी केसरिया, पीला या नारंगी रंग हिन्दू परंपरा में बेहद शुभ माना गया है। 
 
अग्नि संपूर्ण संसार में हवा की तरह व्याप्त है लेकिन वह तभी दिखाई देती है जबकि उसे किसी को जलाना, भस्म करना या जिंदा बनाए रखना होता है। संन्यासी का स्वभाव भी अग्नि की तरह होता है, लेकिन वह किसी को जलाने के लिए नहीं बल्कि ठंड जैसे हालात में ऊर्जा देने के लिए सूर्य की तरह होता है। संन्यासी का पथ भी अग्निपथ ही होता है। ऐसा कहा जाता है कि अग्नि बुराई का विनाश करती है और अज्ञानता की बेड़ियों से भी व्यक्ति को मुक्त करवाती है।
 
सनातन धर्म में केसरिया रंग उन साधु-संन्यासियों द्वारा धारण किया जाता है, जो मुमुक्षु होकर मोक्ष के मार्ग पर चलने लिए कृतसंकल्प होते हैं। ऐसे संन्यासी खुद और अपने परिवारों के सदस्यों का पिंडदान करके सभी तरह की मोह-माया त्यागकर आश्रम में रहते हैं। भगवा वस्त्र को संयम, संकल्प और आत्मनियंत्रण का भी प्रतीक माना गया है।

नोट : उपर आप जो ध्वज देख रहे हैं वह जगन्नाथ मंदिर का ध्वज है।
 

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