वैचारिक मत भिन्नता को राजनीतिक मतैक्य में बदलने की कला में माहिर थे अटलजी

शुक्रवार, 17 अगस्त 2018 (13:10 IST)
लखनऊ। आज जब राष्ट्र के शलाका पुरुष अटल बिहारी वाजपेयी चिरनिद्रा में सो गए हैं तो उनके बारे में इस समय कुछ कहने में गला भरा जा रहा है। यह कहना है अटल की कर्मभूमि रहे उनके निर्वाचन क्षेत्र लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार एवं अटल को अत्यंत करीब से देखने-समझने वाले प्रद्युम्न तिवारी का।


उन्होंने बताया, जब से होश संभाला, तब से अटलजी आंखों में बसे हैं। कारण, मेरे पिता और राष्ट्रधर्म पत्रिका के संस्थापकों में से एक बजरंग शरण तिवारी (अब दिवंगत) शुरुआत से ही अटलजी से जुड़े रहे। ये अंतरंग रिश्ते ही थे कि आजादी से पहले हमारे लखनऊ स्थित आवास पर कुछ दिन अटलजी ठहरे थे।

तिवारी ने बताया कि अटलजी को शुरुआत से ही कुछ इस सहज रूप में पाया जैसे वे आम व्यक्ति हों और उनसे बात में कोई हिचक ना महसूस हुई। जब कुछ राजनीतिक समझ आई तो अटलजी के लखनऊ आने पर एक दिन सहज रूप से उनसे पूछ बैठा कि आप राजनीति में क्यों आए, जबकि आपकी लेखनी प्रबल है।

इस पर अटल बोले, राजनीति में आने का मकसद कोई धन कमाना नहीं होता, राजनीति देशसेवा के लिए है और इसे बखूबी निभा भी रहा हूं। अटलजी के साथ बिताए समय को याद करते हुए तिवारी ने बताया कि 1984 में पत्रकारिता के क्षेत्र में नया नया था।

अटलजी लखनऊ आए और मीराबाई मार्ग स्थित राज्य अतिथि गृह के कमरा संख्या—एक में ठहरे हुए थे। मैं जिस अखबार में था, उसके लिए उनका साक्षात्कार लेने पहुंच गया। नया था इसलिए मन में घबराहट भी थी कि इतने बड़े नेता का साक्षात्कार कैसे करूंगा। पर अटलजी से मिलने और परिचय देने के बाद जब साक्षात्कार की बात कही तो वे मुस्कराए और कंधे पर हाथ रखकर कहा, पूछो क्या पूछते हो।

उन्होंने बताया कि उस दौर में अटलजी के उदारवादी और लालकृष्ण आडवाणी के कट्टरवादी रुख के चलते दोनों में मतभेद की अटकलें थीं। मैंने पहला ही सवाल किया कि आप में और आडवाणी में मतभेद हैं, फिर पार्टी किस तरह से पटरी पर सुचारू रूप से चलेगी? इस पर अटलजी ने मुस्कराकर अपनी चिरपरिचित शैली में उत्तर दिया कि कोई मतभेद नहीं हैं। हम लोगों में विचार विनिमय होता है। इसको मतभेद का नाम देना उचित नहीं है।

तिवारी ने अगला सवाल किया कि क्या विपक्ष में 1977 जैसी एका हो पाएगी? तो जवाब आया कि हम आशान्वित हैं। अगर सत्ता का पहिया पटरी से उतर रहा है तो जाहिर है कि विपक्ष का दायित्व है कि वह मिलकर इसे संभाले। इस दिशा में पहल कौन करेगा? इस सवाल पर अटलजी ने कहा, हम करेंगे।

तिवारी के अनुसार, 'अटलजी का यह वाक्य इस मायने में भी आज प्रासंगिक है कि उनके करिश्मे की वजह से ही आज राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) अस्तित्व में है, अटल में वैचारिक मतभेदों को राजनीतिक मतैक्य में बदलने की अद्भुत कला थी। इसी का नतीजा है कि आज देश में एनडीए की स्थिर सरकार है। (भाषा)

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