सबरीमाला मंदिर के बहाने : स्त्री का प्रवेश नहीं पर व्रत-उपवास सारे वही करें...

हाल ही में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली महिलाओं के दो टुकड़े कर देने जैसे बयान सामने आए हैं। इसके पूर्व में भी कई जगह धर्मस्थलों पर स्त्रियों का प्रवेश प्रतिबंधित है... तो कहीं कुछ धार्मिक अनुष्ठानों से स्त्री को वंचित रखा जाता है। जैन धर्म में स्त्रियां अभिषेक नहीं कर सकतीं। शायद मूर्ति भी नहीं छू सकती।
 
और तो और, जैन धर्म के दशलक्षण की एक पूजा में 'संसार में विषबेल नारी' जैसी पंक्तियां हैं। (समझ नहीं आता कि नारी विषबेल है तो उससे जन्म लेने वाला तो विषफल ही होगा ना...?।
 
बहरहाल, ये सारे विचार दिमाग की आंच पर इसलिए खदबदा गए कि पिछले माह ही कुछ ऐसे पर्व गए, जो स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु व उसकी रक्षा के लिए किए जाते हैं। 
 
सिन्धी समाज का ये सुहाग पर्व रक्षाबंधन के तीसरे दिन 'तीजड़ी व्रत' के रूप में रखा जाता है जिसमें महिलाएं दूध, पके चावल, अगरबत्ती व जल से चन्द्र को अर्घ्य दे पति की मंगल-कामना व दीर्घायु की दुआ मांगती हैं।
 
महाराष्ट्रीयन परिवारों में वट सावित्री का पर्व भी सुहाग की मंगल-कामना से किया जाता है। यमराज से अपने पति के प्राण पुन: लौटा लाने वाली सावित्री की कथा हम सब जानते हैं।
 
इसी प्रकार हरतालिका व्रत वैष्णव समाज की स्‍त्रियों द्वारा भाद्रपद माह की पहली तीज को किया जाता है। शिव-पार्वती के अटूट दांपत्य को समर्पित यह पर्व कुंआरी कन्याओं से लेकर विवाहित स्त्रियां तक करती हैं।
 
बांग्ला स्त्रियां भी दुर्गा पूजा के आखिरी दिन सिन्दूर खेला के नाम से पूजा करती हैं। ये पूजा भी महिलाओं द्वारा एक-दूसरे को सिन्दूर लगाकर सुहाग की लंबी आयु की कामना के लिए की जाती है।
 
और आने वाले दिनों में आने वाला है 'करवा चौथ'। फिल्मों में भव्य रूप से मनाए जाने के कारण इस व्रत के बारे में शायद लोग ज्यादा जानते हैं। ये मुख्य रूप से पंजाबी परिवारों में मनाया जाता है। अन्य हिन्दू स्त्रियां भी करवा चौथ का व्रत रखती हैं।
 
कुल मिलाकर यह कि सारे व्रत-त्योहार स्त्रियों के जिम्मे...! धार्मिक कार्यक्रम अथवा प्रवचन भी आजकल टेलीविजन कर देखे जाएं, तो उनमें लगभग 80 प्रतिशत स्त्रियां ही होती हैं। अनुपात देखा जाए तो स्त्रियां, पुरुषों के मुकाबले अधिक धर्म का पालन करती हैं। क्यों स्त्रियां ही व्रत रखती हैं? क्या वे पुरुषों से अधिक मजबूत हैं? कारण जो भी रहते हों, पर यह सत्य है। ऐसे में कुछ मंदिरों में स्त्रियों का प्रवेश निषेध व शब्दों से उन्हें प्रताड़ना आक्रोश पैदा करता है।
 
लिंगभेद कहां-कहां किस रूप में आपसी वैमनस्यता का जहर फैला रहा है, विचारणीय है।

 
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