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Life in the time of corona : क्या कहते हैं NRI युवा, कैसी बीत रही है उनकी जिंदगी

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डॉ. छाया मंगल मिश्र

covid19: लॉकडाउन के दौरान विदेशों में फंसे अप्रवासी भारतीय युवाओं का दर्द
 
2019 दिसंबर में चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस प्रकोप के बाद जब जनवरी 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने इसे महामारी घोषित किया, तब से ही संपूर्ण विश्व में अफरा-तफरी मची हुई है। खासतौर पर लॉकडाउन के बाद से सभी विमान यात्राएं, रेल यात्रा और बस यात्रा बंद किए जाने के बाद जो जहां था, वहीं रह गया है। एक ओर जहां हम हमारे परिवार के साथ घर में सुरक्षित हैं, वहीं कई भारतीय विदेशों में हैं, जो शायद अपने परिवार से दूर हैं, जो या तो पढ़ रहे हैं या नौकरी कर रहे हैं। जो कुछ कारणों से भारत लौट नहीं सके।

भारतीय विदेश मंत्रालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 17 मिलियन भारतीय बाहर थे। 2019 में 1,24,99,395 NRI, 1,55,92,357 पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन बाहर थे। इसमें सबसे ज्यादा भारतीय सऊदी अरब में हैं। इनमें छात्र भी शामिल हैं जिनकी संख्या करीब 4 लाख है।

ये छात्र सबसे ज्यादा संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इन छात्रों द्वारा किस देश के शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश लेना है, इसका निर्णय उनकी भविष्य की योजनाओं पर निर्भर करता है। इसमें किस प्रकार की नौकरी, तनख्वाह और इंडस्ट्री में वे जाना चाहते हैं, यह शामिल होता है।

तो इन छात्रों और भारतीय परिवारों का लॉकडाउन कैसा जा रहा है? क्या वे वहां सुरक्षित महसूस कर रहे हैं? यूनाइटेड नेशंस की सुरक्षा को-ऑर्डिनेटर सुनीता शर्मा बताती हैं कि एक बार आप विदेश में रहना शुरू कर दें और वो भी अकेले तो आपके सहकर्मी ही आपके परिवार की भूमिका अदा करते हैं। फिर वे ही आपका परिवार हैं। लॉकडाउन के पहले ही मेरे सभी सहकर्मी अपने-अपने देश व अपने परिवार के पास चले गए थे। अब वे लौट भी नहीं सकते, न मैं भारत जा सकती हूं। हालांकि हम सभी 'वर्क फ्रॉम होम' कर रहे हैं, लेकिन याद आने पर वीकेंड पर हम सभी 'जूम ऑनलाइन डांस पार्टी' भी कर लेते हैं।

इटली में कोरोना वायरस ने काफी लोगों को संक्रमित किया है। एक ओर जहां कई भारतीय छात्रों ने लॉकडाउन के तुरंत पहले भारत आने का निर्णय लिया, वहीं कुछ ऐसे भी हैं, जो वहीं रुक गए। सेपिएंजा यूनिवर्सिटी ऑफ रोम से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे अनंत शुक्ला का कहना है कि अभी लॉकडाउन को 1 ही महीना हुआ है लेकिन यह 1 साल जितना लंबा महसूस हो रहा है। मैं भारत इसलिए नहीं आया, क्योंकि शायद मेरे आने से मेरे परिवार को भी संक्रमण हो सकता था।

अनंत कहते हैं कि हो सकता है कि आने वाले कुछ समय में मंदी हो, लेकिन फिर भी मैं सकारात्मक सोचना चाहता हूं। हम हमेशा चाहते हैं कि हमें लंबे समय की छुट्टी मिले, काम से आराम मिले और अब जब हमें मिल रहा है तो हम सभी परेशान हैं। क्यों न इन दिनों को छुट्टी ही मान लिया जाए? ऐसा सोचने से शायद हालात तो नहीं बदलेंगे लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि कुछ अच्छा सोचेंगे तो इस समय से निपटने की हिम्मत तो मिल ही जाएगी।

उप्पसला यूनिवर्सिटी से पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहीं विजया मिश्रा का कहना है कि स्वीडन में लॉकडाउन इतना गंभीर नहीं है। यहां सभी को जरूरत का सामान लेने के लिए बाहर जाने की अनुमति है, लेकिन फिर भी ऑनलाइन क्लास ही चल रही है। हम लोगों का ग्रेजुएशन इस साल पूरा होना था लेकिन अब कोरोना के लॉकडाउन की वजह से शायद यह स्थगित हो जाएगा। हमें आगे नौकरी मिलने की भी चिंता है। 

काफी भारतीय जो विदेश में हैं और वे सभी वर्क फ्रॉम होम कर रहे हैं। लेकिन कुछ भारतीय डॉक्टर भी हैं, जो दिन-रात covid के मरीजों के इलाज में लगे हुए हैं। डॉ. पुल्केश भाटिया मिशिगन में अपने 18 महीने के बेटे और अपने 60 वर्षीय माता-पिता के साथ हैं, वहीं उनकी पत्नी डॉ. वरदा सिंघल न्यूयॉर्क में हैं और covid पैशेंट के इलाज में सेवा में हैं। वे वहां अकेले हैं, आइसोलेशन में हैं और परेशान भी हैं, क्योंकि वे अपने बेटे से मिलने तक नहीं आ पा रही हैं।

वहीं पुल्केश बताते हैं कि वे दिनभर अस्पताल में रहने के बाद रात को घर आकर नहाकर डिसइंफेक्ट होते हैं ताकि उनके बेटे या उनके माता-पिता को किसी भी प्रकार का संक्रमण न हो जाए। हम लोगों के वर्क-वीसा की सीमा भी समाप्त होने में है। हो सकता है कि लॉकडाउन की वजह से इसे रीन्यू कराने में भी समय लगे।

प्राइसवॉटरहाउस कूपर में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य शर्मा का कहना है कि हम ऑफिस का काम भी घर से कर रहे हैं, हालांकि हमें खुद और घर का ख्याल रखने का ज्यादा समय अब मिल पा रहा है। आमतौर पर ऑफिस पहुंचने में 2 घंटे लगते थे, उस समय में अब हम बाकी काम कर पा रहे हैं। परिवार पूरा भारत में है। वे सभी चिंतित हैं, लेकिन हम रोज सभी से ऑनलाइन बात कर लेते हैं। भारतीय आंत्रप्रेन्योर के धंधे पर भी काफी असर पड़ा है।

फिलाडेल्फिया में डॉ. गौरव लालवानी की कंपनी मेडिकल डिवाइस बनाने का काम करती है। वे बताते हैं कि सरकार की तरफ से उनको काम करने की अनुमति है लेकिन वे सभी घर से काम कर रहे हैं। सभी डिलीवरी घर से हो रही है, लेकिन सभी सामान को अल्कोहल बेस्ड डिसइंफेक्टेंट से साफ किया जा रहा है। हमारा ढाई माह का बेटा भी है जिसका हमें ज्यादा ध्यान रखना पड़ रहा है। साथ ही हमारे माता-पिता भी हैं।

तनुज बबेले ट्रांस सॉल्युशंस में एसोसिएट हैं। वे कहते हैं कि पिछले 3 हफ्तों में ही 15 लाख लोगों ने बेरोजगारी की शिकायत की है। आने वाले समय में यह आंकड़ा और भी ऊपर जाने की आशंका है। छात्र ग्रेजुएट होंगे तो और भी अधिक नौकरियों की आवश्यकता पड़ेगी। विदेश में ईस्टर की छुट्टियां भी चल रही हैं।

बर्लिन की निमिशा अपने परिवार और 2 छोटे बच्चों के रह रही हैं। उनका कहना है कि हमेशा ईस्टर के दौरान सभी बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी के साथ रहते हैं, ईस्टर एग ढूंढते हैं। इस बार कोई भी सोशल डिस्टेंसिंग के कारण कहीं जा नहीं सकता इसलिए हमने घर पर ही बच्चों के लिए ट्रेजर हंट का आयोजन किया। साथ ही बच्चों के स्कूल से हमें ई-मेल के जरिए यह बताया जाता है कि कौन से हफ्ते में क्या पढ़ाया जाना है? इस हिसाब से हम सभी अपने बच्चों की होम स्कूलिंग भी कर रहे हैं।

सारा विश्व covid19 से ग्रस्त है, लेकिन इस सब में एक सुकून की बात है कि हर कोई आने वाले समय को लेकर सकारात्मक है। हर किसी को उम्मीद है कि यह जल्द ही खत्म होगा और सब एक नए रूप से अपनी जिंदगी शुरू कर सकेंगे!

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