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अब पीछे हटने का प्रश्न ही कहां है?

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अवधेश कुमार

जब देश अपने भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए कठिन फैसला कर उसे अंजाम देने में लगता है तो सभी देशवासियों का दायित्व हो जाता है, अपनी अंत:शक्ति पर विश्वास एवं सारे मतभेद भुलाकर साथ खड़ा हो जाना। भारत ने वर्षों की अर्जुन ग्रंथि को खत्म कर आतंकवाद पर प्रहार करने लिए आकाश मार्ग से सीमा को पार किया। ऐसे युगांतकारी कदम के लिए भारत न जाने कितने वर्षों से छटपटा रहा था।


 
पाकिस्तान ने सच को चाहे जितना नकारने की कोशिश की हो, ले‍किन दुनिया के प्रमुख देशों को पता चल गया। अमेरिका की उपस्थिति पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान में है, चीन वहां है, रूस व ब्रिटेन की खुफिया सक्रियता है। इसमें भारत यदि अपने लक्ष्य में बिलकुल सफल नहीं होता तो हम दुनिया के सामने सिर उठाकर खड़ा नहीं हो पाते। यदि भारत दृढ़ता से खड़ा है तो इसीलिए कि उसने दुनिया को बता दिया है कि आतंकवाद के सीमा पार स्रोत को नष्ट करने में वह सक्षम है और यह कार्रवाई भविष्य के लिए एक संदेश है।

 
पाकिस्तान सरकार ने अपनी संसद में स्वीकार किया है कि भारत के 14 विमान आए। भारत ऐसा देश नहीं है, जो बिना कार्रवाई की सफलता के ही नई दिल्ली स्थित प्रमुख देशों के राजनयिकों को बुलाकर कार्रवाई के बारे में विस्तार से जानकारी दे। कुछ देशों के राजनीतिक नेतृत्व के साथ तो फोन पर भी बात की गई।
 
हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश का एक वर्ग भारत की सूचना से ज्यादा पाकिस्तान के दावों, खंडन और फेक सूचना पर विश्वास करता है। ऐसे लोगों की अपनी कुंठा और देश की क्षमता में अविश्वास इसका कारण है। 28 फरवरी को सेना के तीनों अंगों की पत्रकार-वार्ता और 4 मार्च को खुद वायुसेना प्रमुख के वक्तव्य के बाद इसे लेकर हर प्रकार का संशय खत्म हो जाना चाहिए कि पुलवामा, पठानकोट, उड़ी और 2001 के संसद हमले सहित अनेक हमलों के अपराधी जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख ठिकानों पर लक्ष्य साधने में सफलता मिली है।

 
इन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि हमारी लड़ाई आतंकवाद के खिलाफ है और अगर पाकिस्तान आतंकवादियों को संरक्षण देना आगे भी जारी रखता है तो ऐसी कार्रवाइयां भी जारी रहेंगी। इसके एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तीनों सेना प्रमुख के साथ बैठक की थी जिसके बाद फिर सरकार का बयान आया था कि सेना को कार्रवाई की पूरी स्वतंत्रता है।

 
सेना के तीनों अंगों की पत्रकार-वार्ता से साफ हो गया कि सीमा पार आतंकवाद के खात्मे का सैन्य दायित्व इन्होंने अपने सिर मान लिया है। एक लोकतांत्रिक देश के कारण भारत में राजनीतिक नेतृत्व सेना के लिए राष्ट्रीय लक्ष्य तय करता है और सेना अंजाम देती है। ऑपरेशन, रणनीतिक तथा युद्धनीति सेना तय करती है। सेना के तीनों अंगों के बयान से साफ है कि उनको एक लक्ष्य मिला है। आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध लड़ने का यही तरीका है।

 
इसमें अभी तक तो सफलता मिली है। सेना ने बयान दे दिया है कि तीनों ठिकानों पर हमने भारी तबाही मचाई है जिसके सबूत हमारे पास हैं, पर उसे कब दिखाना है यह निर्णय राजनीतिक नेतृत्व को करना है। आतंकवादी केंद्रों पर हमले से भन्नाए पाकिस्तानी वायुसेना ने राजौरी के ब्रिगेड मुख्यालय, बटालियन मुख्यालय और अन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी। यह सीधे युद्ध छेड़ना था किंतु भारत ने अपनी कार्रवाई से उनको नाकाम करने तक ही सीमित रखा।

 
पाकिस्तान ने तो यह झूठ बोल दिया कि हमने एफ-16 का प्रयोग ही नहीं किया। सेना ने सबूत देकर बता दिया कि भारतीय वायुसेना ने एफ-16 को मार गिराया। हमारा भी एक मिग-21 गिरा और पैराशूट से बाहर आया पायलट उनके कब्जे में आ गया था। एफ-16 से दागी गई उस मिसाइल के टुकड़े सेना ने दिखाए, जो भारतीय क्षेत्र राजौरी में मिले हैं।

 
पाकिस्तान के पास ऐमरैम मिसाइल लेकर उड़ने वाला एक ही विमान है- एफ-16। पाकिस्तान द्वारा सैन्य प्रतिष्ठान पर हमले की कोशिश को नाकाम करने के साथ ही भारत को पाकिस्तानी सेना के खिलाफ कार्रवाई का अधिकार प्राप्त हो गया है, पर हमारी नीति अभी आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई तक ही सीमित है। अगर पाकिस्तान इसे विस्तारित करेगा तो सेना को कार्रवाई की छूट मिली हुई है।

 
शंका करने वालों को शायद यह अंदाजा नहीं हो कि पाकिस्तान के 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में 80 प्रतिशत यानी 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर तक के एक छोटे कण तक को हम अपने उपग्रहों के माध्यम से देख सकते हैं। एकदम अच्छे रिजॉल्यूशन की मैपिंग की सुविधा हमारे पास है। घरों के दरवाजों और खिड़कियों यहां तक कि अनेक घरों के अंदर भी हमारी नजर जाती है इसलिए अंधेरे में वायुसेना को तीर नहीं मारना था। निशाना साफ था।

 
खैबर पख्तूनख्वा के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों को विचार और हथियार दोनों से तैयार किया जाता था। पिछले 5 सालों में करीब 225 आतंकवादी बालाकोट से कश्मीर में भेजे गए थे। सुरक्षा एजेंसियों को पता चला था कि वहां से प्रशिक्षित 36 से 41 आत्मघाती आतंकवादी जल्द ही भारतीय सीमा में प्रवेश की तैयारी कर रहे थे। सेना, आईबी, रॉ, एनआईए और जम्मू-कश्मीर के सुरक्षा बलों की संयुक्त रिपोर्ट पर पूरी चर्चा करने के बाद ही बालाकोट पर वायु हमले किए गए।

 
सेना और बीएसएफ के जवानों पर निशाना साधने वाले बैट (बॉर्डर एक्शन टीम), जिसे जैश का सहयोगी माना जाता है, के सदस्य भी बालाकोट में ही तैयार होते थे। बलूचिस्तान में राजनीतिक हत्याओं, बलूचों के बीच आतंक फैलाने और बम विस्फोटों के लिए बालाकोट से आतंकवादी बुलाए जाते थे। यह संक्षिप्त जानकारी देना इसलिए जरूरी था ताकि हमारे देश के 'महान' विघ्नसंतोषियों की आंखें खुलें।

 
भारतीय कार्रवाई के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान 2 बार सार्वजनिक रूप से बयान दे चुके हैं। एक बार संसद में बोला है, जो भारत एवं दुनिया के लिए ही था। वे वार्ता के लिए निमंत्रण दे रहे हैं। किस विषय पर वार्ता? आप प्रधानमंत्री हैं। आपके पास जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के स्रोत, प्रायोजन आदि की जानकारी है ही नहीं तो फिर आपसे क्यों बात करना? यह सामान्य सिद्धांत है कि एक बार साहस करके कदम बढ़ा दिया तो भावनाओं या दबाव में आकर उसे न रोकिए, न पीछे लौटिए, तार्किक परिणति तक पहुंचाइए।

 
भारत को यह समझ तो पहले भी थी कि पाकिस्तान राष्ट्र का लक्ष्य ही हमें विखंडित करना है और उसके लिए वे मजहबी आतंकवाद का इस्तेमाल करते हैं जिसमें बिना खर्च के ज्यादा तबाही मचाएं और अपने मजहब के युवाओं का मन बदल सकें। किंतु नीतियों में यह परिलक्षित नहीं होता था। कभी कठोर तो फिर नरम, कभी आगे तो तुरंत पीछे के कारण पाकिस्तान के अंदर यह भाव पैदा हो गया कि भारत को कभी भी भावुकता में लाकर ठगा जा सकता है। इस नीति ने जम्मू-कश्मीर को बरबाद कर दिया।

 
इस एक कार्रवाई के द्वारा दुनिया और पाकिस्तान को संदेश दिया गया है कि भारत बदल चुका है और हमारे पास यह क्षमता है कि हम आतंकवाद के केंद्रों को उनकी सीमा में घुसकर नष्ट कर सकते हैं। यह एक ट्रेलर है। उसके बाद भारतीय सत्ता प्रतिष्ठान बिलकुल सामान्य गतिविधियां करता रहा। 25 फरवरी को जहां चारों ओर हलचल थी, प्रधानमंत्री सुबह राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में शामिल हुए, उसके बाद राजस्थान के टोंक में आमसभा को संबोधित किया, फिर राजधानी दिल्ली आकर मेट्रो से बिलकुल सामान्य स्थिति में इस्कॉन गए, जहां गीता पर भाषण दिया। उसके बाद सरकारी बैठकें कीं।

 
सरकार किसी भी पार्टी की हो, यहां प्रश्न भारत का है और ऐसी भूमिका से दुनिया को पता चल गया कि यह बदला हुआ भारत है, जहां इस तरह की कार्रवाई हमारे लिए बिलकुल सामान्य है। इसमें यह भी संदेह था कि यदि भारत ने फोकस करके कार्रवाई की तो पाकिस्तान की बुरी दशा होगी। यह नहीं हो सकता कि भारत में शांति के कबूतर उड़ाने वालों या पीस एक्टिविस्टों की डिइस्कैलेशन की मांग से फिर बातचीत की पुरानी गलती की पटरी पर आ जाएं। जब इस्कैलेशन है ही नहीं तो डिइस्कैलेशन का प्रश्न कहां है? बातचीत के इतिहास को दुहराने की आवश्यकता नहीं।

 
भारत के पास अब विकल्प यही है कि चाहे जितनी क्षति उठानी पड़े, भारत केंद्रित आतंकवाद के स्रोतों को नष्ट करने की प्रक्रिया जारी रखे। कश्मीर में पिछले 2 सप्ताह में जबरदस्त कार्रवाई हुई है। जेहादी वैचारिकी को फैलाने वाले हिज्बुल के मुखौटा जमायत-ए-इस्लामी के प्रमुख नेताओं की गिरफ्तारी के बाद उस पर प्रतिबंध लग गया है। हुर्रियत बिना सुरक्षा के कर दिए गए। अब अगला नंबर उनका ही है।

 
अतिरिक्त सुरक्षा बल उतारे गए हैं। आतंकवाद के केंद्र 5 जिलों में ऑपरेशन जारी है। 1954 के राष्ट्रपति के आदेश में संशोधन कर आरक्षण लागू करने का साहसी ऐलान हो गया है। यह भी ऐतिहासिक निर्णय है। इससे कश्मीरी हिन्दुओं को नौकरियों में प्रतिनिधित्व मिलेगा। बाहर निकाले गए हिन्दुओं की नौकरियों के माध्यम से वापसी होगी। वंचित, दलित एवं पिछड़े समुदाय को हक मिलेगा तथा सरकारी सेवा का वर्णक्रम बदलेगा, सरकारी निर्णयों की विचारधारा प्रभावित होगी।

 
कश्मीर में आंतरिक और सीमा पार सैन्य कार्रवाई को साथ मिलाकर देखें तो साफ नजर आएगा कि दोनों ओर युगांतकारी कारवां निकल पड़ा है। लक्ष्य तक पहुंचे बिना पथ में पथिक को विश्राम कहां? आतंकवादी केंद्रों को ध्वस्त करने के लिए अभी दृढ़ता से कार्रवाइयां करना होंगी। बहावलपुर और मुरिदके को नष्ट करना ही होगा। इसमें जितनी भी मानवीय एवं अन्य संसाधनों की क्षति हो, उसे सहन करने की मानसिक तैयारी के साथ ऐसा करना चाहिए।

 
धीरे-धीरे राजनीतिक नेतृत्व को लक्ष्य विस्तारित करते हुए सेना को बता देना चाहिए कि हमें कश्मीर के उस भाग को वापस ले लेना है। इसके बाद पाकिस्तान के सिन्ध, बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा में आजादी के अहिंसक आंदोलन को परवान चढ़ाने का लक्ष्य राजनीतिक नेतृत्व को कूटनीतिज्ञों एवं प्रवासी भारतीयों के माध्यम से अंजाम देना है। इसका पाकिस्तान सैन्य जवाब देता है, तो उससे सेना निपटेगी। इन सबको मूर्तरूप दिए बिना भारत का राष्ट्रीय लक्ष्य पूरा हो ही नहीं सकता। बातचीत का स्थान इसमें आता ही कहां है?
 
 
(इस लेख में व्यक्त विचार/विश्लेषण लेखक के निजी हैं। इसमें शामिल तथ्य तथा विचार/विश्लेषण वेबदुनिया के नहीं हैं और वेबदुनिया इसकी कोई ज़िम्मेदारी नहीं लेती है)

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