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प्यार का रसायन !

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- धर्मेन्द्र जैन 'विरक्त'
Devendra SharmaND

ना ये केमिस्ट्री होती, ना मैं स्टूडेंट होता
ना ये लेबोरेटरी होती, ना ये एक्सीडेंट होता
कल प्रेक्टिकल में नजर आई एक लड़क

सुंदर थी, नाक थी उसकी टेस्ट ट्यूब जैसी
बातों में उसकी, ग्लूकोज की मिठास थी
साँसों में एस्टर की खुशबू भी साथ थी
आँखों से झलकता था कुछ इस तरह उसका प्यार
बिन पिए ही हो जाता था एल्कोहल का खुमा

बेंजीन सा होता था उसकी उपस्थिति का एहसास
अँधेरे में होता था रेडियम का आभास
नजरें मिलीं, रिएक्शन हुआ
कुछ इस तरह प्यार का प्रॉडक्शन हुआ
लगने लगे उसके घर के चक्कर ऐसे
न्यूक्लियस के चारों तरफ इलेक्ट्रॉन हों जैसे
उस दिन हमारे टेस्ट का कन्फर्मेशन हुआ
जब उसके डैडी से हमारा इंट्रोडक्शन हुआ

सुनकर हमारी बात वो ऐसे उछल पड़े
इग्नीशन ट्यूब में जैसे, सोडियम भड़क उठे
बोले, होश में आओ, पहचानो अपनी औकात
आयरन मिल नहीं सकता कभी गोल्ड के साथ
यह सुनकर टूटा हमारे अरमानों भरा बीकर

और हम चुप रहे बेंजल्डिहाइड का कड़वा घूँट पीकर
अब उसकी यादों के सिवा हमारा काम चलता न था
और लैब में हमारे दिल के सिवा कुछ जलता न था
जिंदगी हो गई असंतृप्त हाइड्रोकार्बन की तरह
और हम फिरते हैं आवारा हाइड्रोजन की तरह।

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