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बच्चों का खेल

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मो. आरिफ

नाम - मानिक अस्थाना, उम्र - लगभग पचास, पता - प्रेम नगर, दिल्ली। देखिए साहब बात यह है कि आज की दुनिया में सच सुनने का रिवाज नहीं है। सच सुनने को कोई तैयार नहीं। सच लिए घूमते रहिये, सूँघना तो दूर रहा आपकी तरफ कोई देखेगा भी नहीं। सच में झूठ की मिलावट कर दीजिए और देखिए मजा। थोड़ा नमक-मिर्च लगाकर बात करिये, सब सुनेंगे और आपकी तारीफ होगी। सचाई को सच तभी समझेंगे जब उसे कुछ बढ़ाकर पेश करिये या फिउसमें से मनचाही चीजें घटाकर।

खैर यह तो दूसरी बात हुई। वैसे यह दूसरी बात भी उसी बात से जुड़ी हुई है जिससे मैंने अपनी बात शुरू की थी। यानी सच की सचाई। देखिए जी, आज बदली छाई हुई है। ठंडी मंद बयार बह रही है, छत पर अकेला पड़ा हूँ और रेडियो पर विविध भारती से लताजी की आवाज में जाने क्यूँ लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले... वाला गाना बज रहा है।

किसी पढ़े-लिखे बंदे से जरा पूछिए कि भाई तुम्हारी नजर में दुनिया का सच क्या है तो वह बाल में उँगली फेरते हुए कहेगा कि सच तो यह है कि हम सभी को एक न एक दिन मरना है। कोई और कहेगा कि यह दुनिया फानी है, क्षण-भंगुर है। उसी बात को कोई और सज्जन घुमा फिराकर कहेंगे - सच तो यह है कि यहाँ सब कुछ परिवर्तनशील है, अस्थायी है, टेम्पररी है - यहाँ तक कि हमारे दुख भी। आप वाह-वाह कर उठेंगे और सच का नया-पुराना नुस्खा लेकर अपने घर का रुख करेंगे।

अब जरा मेरी स्थिति पर गौर फरमाएँ। मेरे इलाके में आज कैसा मौसम है? बदली छाई है, ठंडी-ठंडी बयार बह रही है। मैं कहाँ हूँ? छत पर अकेले... फुर्सत से विविध भारती सुन रहा हूँ - जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं... दिल के बदले दर्दे-दिल लिया करते हैं। ऐसे में कोई मुझसे पूछे, अच्छा बताइए आपकी नजर में दुनिया का सच क्या है।

आप सोच रहे होंगे मैं तपाक से कहूँगा - प्रेम, मोहब्बत, इश्क...। जी नहीं, मैं भी बात को घुमाना जानता हूँ। मैं कहूँगा दुनिया में एक नहीं, दो सच हैं और वह हैं औरत और मर्द। शुद्ध हिन्दी में कहेंगे दुनिया में दो शाश्वत सत्य हैं - स्त्री और पुरुष। आपका मुँह खुला का खुला रह गया न! इतना बोरिंग जवाब, घिसा-पिटा सा।

अगर मैं कहता प्रेमी-प्रेमिका या आशिक-माशूक तो यह जवाब थोड़ा फिल्मी तो लगता लेकिन स्त्री-पुरुष से बेहतर होता, विशेषकर मेरी स्थिति को ध्यान में रखते हुए कि मैं कहाँ हूँ, क्या कर रहा हूँ और मेरी तरफ मौसम कैसा है।

भाइयों, यह दुनिया एक भूलभुलैया है दोनों इसी में चक्कर काटते रहते हैं। लेकिन हम भूलते कुछ नहीं। भूल जाने का भ्रम पालते रहते हैं या उसका नाटक करते रहते हैं। मैं जरा दिमाग पर जोर देता हूँ तो एक-एक करके वे सारी लड़कियाँ-स्त्रियाँ याद आने लगती हैं जो मुझे मिलीं और अच्छी लगीं। आपको ताज्जुब होगा कि जब मैं बहुत छोटा था - सात या आठ साल का। और दो या तीन में पढ़ता था तो शर्मिला नाम की एक हमउम्र लड़की मुझे बहुत अच्छी लगती थी।

उसकी मम्मी भी मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। हालाँकि उन्होंने कभी मुझसे बात नहीं की। वह शर्मिला को टिफिन खिलाकर चली जाती थी। उन दोनों की शक्ल मुझे अभी तक हू-ब-हू याद है। अगर मैं बताने लगूँ कि शर्मिला और उसकी मम्मी के बाद कब कब कौन मुझे अच्छा लगा और किसने-किसने मुझे आकर्षित किया - कहाँ-कहाँ मेरी भावनाएँ अटकीं तो आप हँसेंगे। मेरा मजाक उड़ाएँगे।

दरअसल आप सच का मजाक उड़ाएँगे। लेकिन कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्हें मेरा यह कुबूलनामा पढ़कर हिम्मत बँधेगी और वे अपना कलेजा टटोलने लगेंगे। उनके सामने भानुमती का पिटारा खुलने लगेगा। मैं गलियों, सड़कों या बाजार में घूम रहा होता हूँ तो कभी-कभी महिलाओं को दूसरी ही नजर से देखता हूँ। वह ऐसे कि अरे ये कितना हँसते-बोलते मस्ती करते, या फिर किसी बात पर चिंता-मग्न फिक्र करते हुए अकेले या सहेलियों के साथ या फिर पति बच्चों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ चली जा रही हैं। लेकिन जब कमसिन थीं तो किसी से प्रेम करती थीं... प्रेम-पत्र लिखती थीं... उसके लिए रोती-गाती थीं। उसी के साथ जीवन-भर साथ रहने के सपने देखती थीं।

लेकिन आज नियम-कानून से किसी और के साथ रह रही हैं तो कहीं बॉसगिरी दिखा रही हैं, प्रिंसिपल और प्रोफेसर बनी लेक्चर झाड़ रही हैं। लेकिन पहले! पहले तो एक अदने से लड़के के पीछे पागल हुआ करती थीं। उस पर जान छिड़कती थीं। वही जो साड़ी पहने शॉल ओढ़े गाड़ी से उतर रही हैं। अगर ये मन के सारे भेद खोल दें तो मजा आ जाए। क़यामत भी आ सकती है।

लेकिन सभी स्त्री-पुरुष यदि मन के भेद खोल दें तो दुनिया कैसी दिखेगी! पहले तो बड़ी खलबली मचेगी, बड़ा हंगामा होगा। लेकिन धीरे-धीरे इन सत्यों और संबंधों के खुलासों को लेकर हम शिथिल पड़ते जाएँगे। दुनिया कितनी अपनी-अपनी लगेगी, सब लोग कितने नजदीकी लगेंगे। लेकिन तब भी कुछ लोग होंगे जिन्हें चिंता होगी और ये लोग एक-दूसरे को फिर से न अच्छे लगने लगें, फिर से न प्रेम करने लगें।

इसे कहते हैं खाम खयाली। आप कहते होंगे, मैं नहीं। आज तो मुझे बस समीरा की याद आ रही है। समीरा सुबह से ‍ही दिमाग पर चढ़ी हुई है। जैसा मौसम है, जैसा गाना बज रहा है और जैसे फुर्सत से मैं छत पर अकेले पड़ा हूँ, उसमें यह तो होना ही था। उसमें यही होता है। समीरा समीरा समीरा समीरा कहाँ हो तुम? कहाँ गायब हो गई तुम दुनिया की भीड़ में? मेरे साथ मेला देखते-देखते कहाँ गुम हो गई? क्या किया तुमने मेरे लौट आने के बाद? किस किस से दोस्ती की? और किस किससे प्रेम?

और शादी किन साहब से हुई? बच्चे कितने पैदा किए? फुटबॉल टीम बनाई कि नहीं। क्या कभी मेरी भी याद आई? आते वक्त तो ऐसे सिसक रही थी जैसे मेरे बिना मर ही जाओगी। देखो समीरा, आज तुम्हारे नाम का एक खत लिखना चाहता हूँ। एक प्रेम पत्र अपनी समीरा को। एक लव लेटर। जैसे हम तब लिखा करते थे।

मैं अपने बच्चों से कहना चाहता हूँ कि वे दूसरे कमरे में चले जाएँ। पत्नी से कहना चाहता हूँ कि वह शॉपिंग करने चली जाए और दिल खोलकर पैसा खर्च कर ले। नौकरों से कहता हूँ कि ‍वे दिनभर की छुट्‍टी ले लें। मेरा लव लेटर कोई न पढ़े। यह समीरा के लिए है उसके मनु की तरफ से। सभी सुन लें कि मानिक साहब एक दिन के लिए इस दुनिया में नहीं रहे। मेरे बच्चे मेरे ऊपर हँसें या मेरी पत्नी मेरे कारण रोए, मुझे परवाह नहीं। मुझे बहुत पहले किसी से इश्क हो गया था। आज न जाने क्यों उसी की याद तरोताजा हो गई है। उसे बताना है कि वह दुनिया की सबसे अच्छी लड़की थी। सबसे सुंदर।

सबसे ज्यादा प्यार करने वाली। सबसे ज्यादा लड़ने वाली। सबसे ज्यादा सोन पापड़ी पसंद करने वाली। दुनिया की सबसे खट्‍टी लड़की, दुनिया की सबसे मीठी लड़की। समीरा मेरी जान! समीरा मेरी डॉल मेरी गुड़िया!

लेकिन बात अभी भी नहीं बन रही है। मेरे कहे के मुताबिक आज सभी लोगों ने मुझे अकेला छोड़ दिया है। अब मुझे एक अँधेरा कमरा चाहिए क्योंकि मैं उसी में अपना असली रूप देख पाऊँगा। अँधेरे के आईने में खुद को निहारूँगा। फिर काली अँधेरी गुफा से समीरा को बाहर बुलाऊँगा और पूछूँगा - पहचानी?

प्रिय समीरा,
लिखता हूँ ख़त से स्याही न समझना।
मरता हूँ तेरी याद में जिन्दा न समझना।

हँसो मत समीरा। पूरा खत पढ़ लो फिर चाहे जो करना। इस शेर का बुरा मत मानना डियर। तुम सोच रही हो कि क्या आज भी मेरे पास इस सस्ते सड़क छाप शेर के अलावा कुछ लिखने को नहीं है। मुँह का स्वाद अगर खराब हो गया है तो माफी चाहता हूँ... पर क्या करूँगा, मैं हूँ ही ऐसा और इसे आखिर तुमसे बेहतर कौन समझ सकता है!

हुआ यों कि छत पर लेटे लेटे... विविध-भारती सुनते हुए... अपने एक साहित्यकार मित्र की एक पुस्तक पढ़ रहा था। उन्होंने लिखा था - बचपन के अनुभवों की स्मृति स्त्री-पुरुष के पहले-पहले प्यार की तरह है जो अद्वितीय और अविस्मरणीय होती है। बस तुम याद आ गई। जीवन का एक काल-खंड सजीव हो गया जो सिर्फ मेरा और तुम्हारा है। वह एक साल! हमारा एक साल - हम दोनों का एक साल। तुम्हारे पति और मेरी पत्नी से अनछुआ प्रेमपगा।

एक अँधेरे कमरे में अकेले बैठा हूँ और अंदर क्या-क्या घट रहा है कैसे बताऊँ। आँखों के सामने सब कुछ कौंध रहा है। एक-एक कर। सच तो यह है कि तुमसे कभी भी मुक्त नहीं हो सका पूरी तरह... तुम्हें प्यार करना बंद कर दिया तब भी। तुम यहीं कहीं रही हो... सदा... लेकिन जिन अनगिनत कोणों से तुम्हें कभी देखा था... देखता था... वे कोण अब नहीं बनते। वे लकीरें अब आपस में नहीं मिलतीं। मिलकर नये चित्र नहीं रचतीं।

जिस दिन मित्र की पुस्तक में वे पंक्तियाँ पढ़कर तुम्हारे बारे में सोचने लगा, उसी रात सपने में तुम आई। अपनी माँ के साथ तुम छत पर बैठी थी। शायद उनका पैर दबा रही थीं। जाने कहाँ से मैं पहुँच गया। मैं भी नीचे ही बैठ गया। मुझे अचरज हुआ कि तुम्हारी मम्मी मुझसे अच्छी-अच्छी बातें कर रही हैं। कह रही हैं, मानिक बाबू... लीजिए गुड़िया का हाथ मैं आपके हाथों में देती हूँ... आप इसको चाहते हैं न! इसने आज मुझे बताया कि आप इसे बहुत चाहते हैं... तो ले जाइए इसे... खुश रहेगी आपके साथ।

लेकिन उन दिनों... किन दिनों... याद करो... बहुत दिनों पहले... बहुत बहुत दिनों पहले युगों पहले... जब छोटे शहरों की सड़कें इतनी भरी-भरी नहीं होती थीं... जब जाड़े की इतवारों को सब कुछ कितना शांत और सुलझा रहता था... जब र‍ेडियो और स्कूटर का राज था... जब पोस्टमैन को देखकर दिल खुश होता था... तब तो तुम्हारी मम्मी मुझे तुम्हारी ओर ताकने भी नहीं देती थीं। हम लोग उन दिनों कितने बड़े थे? क्या बहुत छोटे थे हम? इतने छोटे भी नहीं थे कि लोग हमें बेहिचक एक-दूसरे से मिलने-जुलने की छूट देते। कब देखा था तुम्हें पहली बार?


कौन-सा जुमला था जो मैंने तुमसे पहली बार बोला था। कौन-सा दिन था वह। कौन सी जगह थी। अँधेरे घुप कमरे में बैठे हुए मैं शीशे से गर्द हटाता जा रहा हूँ और सब कुछ साफ होता जा रहा है। शायद किसी त्योहार का दिन था जब मैंने तुमसे पूछा था - किस क्लास में पढ़ती हो तुम? तुम्हें तो जैसे इसी का इंतजार था। बस शुरू हो गई थी तुम। त्योहार के बहाने एक दिन में तीन बार ड्रेस चेंज किया था तुमने। हर बार और अच्छी लगी थी तुम मुझे। हो सकता है तुम्हें लगे मैं जज्बाती और रूमानी मनचले किशोर में तब्दील हो गया हूँ।

आई डोंट केयर समीरा। मैं देख रहा हूँ एक लड़की को... गाती-गुनगुनाती ... कभी छत की रेलिंग से लटकी... कभी यों ही घूमती टहलती... कुछ खोजती तलाशती। और देख रहा हूँ तुम्हें मुस्कराते, हँसते खिलखिलाते। फिर देख रहा हूँ तुम्हें पैदल चलते हुए... रिक्शे पर बैठे हुए, बैग लेकर स्कूल से आते हुए... छत पर खड़ी होकर कंघी करते हुए या सूखे कपड़े उठाते हुए। कभी एक चोटी में, कभी दो चोटी में तो कभी खुले बालों में मेरे कमरे के सामने से गुजरते हुए।

जिस दिन तुम्हें छत पर बैठकर अपनी माँ का पैर दबाते हुए सपने में देखा, उसके दूसरे ही दिन बाजार गया। दिलो-दिमाग पर खड़ी दो महिलाओं को ऊन के लच्छों पर हाथ फेरते देखा। उनमें से एक वाकई सुंदर थी। दूसरी बस ठीक-ठाक। मोटी... कुछ चौड़ी-चौड़ी बेतरतीबी से साड़ी पहने हुए, बेडौल-सा पर्स टाँगे। वह तुम्हारे जैसी लग रही थी। मैं उसे गौर से देखने लगा। वह तुम्हारे जैसी ही थी। बिल्कुल तुम। क्या वह तुम थी समीरा? जब वह महिला दुकान से बाहर आई तो मैंने उसकी चाल पर गौर किया। मैंने सोचा बड़ी होकर तुम इसी महिला की तरह हो गई होगी।

घर लौटा तो तुम्हारे बारे में सोचता रहा। जाने क्यों एक तरह की वितृष्णा से भर गया। मुझे लगा मैं तुम्हें इस रूप में नहीं देख सकता। सपने में कितनी सुंदर, कितनी भोली-भाली लगी थी तुम। कुछ-कुछ उदास थी। बिन ब्याही रह गई थीं तुम मेरी प्रतीक्षा करते। पर सामने से देखने में कैसी हो गई थी। अपने बड़े, विवाहित रूप में तुम ऐसी हो जाओगी, मैंने कल्पना में भी नहीं सोचा था।

पर, समीरा, मुझे इन चीजों से क्या लेना-देना। तुम्हारा वर्तमान मेरा सरोकार नहीं है। मेरा संबंध तो तुम्हारे भूतकाल से है। तुम्हारे बीते जीवन के उस काल से जब तुम बसंत में पुष्प की तरह खिली थीं। तुम्हारे उस कालखंड पर तुम्हारे बाद मेरा अधिकार है। सिर्फ मेरा।

तुम्हें पत्र लिखने की वजह यह भी है, मैं तुम्हें याद दिलाना चाहता हूँ कि तुम कभी मेरी थीं। बस मुझे जिद सवार हो गई है कि तुम्हें बताऊँ कि हम दोनों ही कभी एक-दूसरे को कितना चाहते थे। मरते थे एक-दूसरे पर। कितने ही लोगों के साथ ऐसा हो चुका है। हमारे तुम्हारे साथ भी ऐसा हुआ।

ख़त लिखने के दो कारण और हैं। तुम्हें या किसी को भी अजीब लग सकते हैं ये कारण। उतने ही मजबूत कारण जो मैंने ऊपर बताया। एक तो यह कि मैं मन ही मन अपनी पत्नी को जताना चाहता हूँ कि उसके अलावा भी मुझे कोई चाहने वाला गुजर चुका है। ऐसी चाहत का हकदार मैं रह चुका हूँ जिसे लफ्‍जों में बयान कर पाना नामुमकिन है। फिर भी कोशिश करूँगा। साथ ही तुम्हारे पति से न जाने क्यों मुझे ईर्ष्या हो रही है।

माफ करना मेरी नासमझी को लेकिन सुन लो। मैं तुम्हारे पति को बताना चाहता हूँ कि जनाब जो स्त्री आपके बच्चे पाल पोस रही है, आपके साथ हमबिस्तर होती है, आपके घर की मालकिन है, वह कभी मेरी थी। पूरी की पूरी मेरी। उसके वजूद पर मैं, मानिक अस्थाना उर्फ मनु काबिज था। यह हक उसने मुझे दिया था। इसमें उसकी पूरी रजामंदी थी। कहती थी मेरे बिना वह अधूरी है, कहीं उसका मन नहीं लगता है, कोई उसे अच्छा नहीं लगता है। प्रेम का पहला अंकुर जब उसके दिल में फूटा तो उसने मुझे अपने सामने पाया। प्रकृति का दिया हुआ प्रथम पुष्प था - पहली बहार की खुशबू समेटे - जो मेरी प्रेयसी ने मुझ पर लुटा दिया।

नेचर ने जब उसके बदन को गमकाया तो वह मेरे सामने प्रस्तुत हुई। मैंने उसे सूँघा, सराहा। उसके कुँआरे शरीर की गंध मस्त कर देने वाली थी। जिस गंध को आप जानते होंगे वह 'वह' नहीं है। तब वह परफ्‍यूम शैम्पू और मेकअप नहीं लगाती थी। उसके बदन की सच्ची खुशबू से सिर्फ मैं वाकिफ हूँ। आप नहीं। जब वह जवान हो रही थी उस दौर को मैंने जाना है, मैंने देखा है। मैं गवाही देता हूँ कि वह एक अजीब दौर था... अजीब समय था... उड़ते-फिरते थे बादलों में हम दोनों... शब्दों से परे है आवारा हवाओं का वह खूबसूरत मौसम। वह बयार अब क्यों नहीं बहती... वे बादल लौटकर अब क्यों नहीं आते।

कच्ची उमर का आकर्षण समझकर आप इसे दरकिनार न कर दीजिएगा। यह एक सच्चाई है, हकीकत है हम दोनों के जीवन का। इसने आज तक मेरा पीछा नहीं छोड़ा है। और शायद आपकी वाइफ का भी। पता नहीं आप उसे किस उम्र में मिले। मेरी उससे भेंट तब हुई थी जब वह सोलह की थी और मैं उससे दो साल बड़ा। पहली ही नजर में वह मर मिटी थी मुझ पर। वह मुझे एक पल के लिए भी अपने से दूर नहीं होने देना चाहती थी... रोती थी मेरे लिए, हँसती थी मेरे लिए, पूजती थी वह मुझे।

राह तकते छत पर छुपी खड़ी रहती थी। पागल दीवाने थे हम दोनों एक-दूसरे के लिए। मैं हिम्मत दिखाता तो वह मेरे साथ भाग सकती थी... मैं उकसाता तो वह आत्महत्या तक कर लेती।

एक दिन वह आई, गुस्से में थी। गुस्से में कमसिन लड़कियाँ सुंदर लगने लगती हैं। वह सुंदर से भी अधिक सुंदर लग रही थी। मैंने कहा पप्पी लेने आई हो क्या। वह बोली मजाक मत करो, मेरा ड्रेस देखो, मन कर रहा है यहीं तुम्हारे सामने ही उतारकर फेंक दूँ। उसका चेहरा तमतमा रहा था। मैंने इधर-उधर देखा और चुम्मी लेने के लिए झपटा। वह मुझसे तेज निकली। अपना दाहिना हाथ मेरे होठों पर चिपकाते हुए बोली, देखो मुझे क्या पहना दिया है। ये सलवार सूट मुझसे नहीं सँभलता। उतार दूँ यहीं तुम्हारे सामने तो शरमा जाओगे... बोलो। मैं कुछ नहीं बोला। वह कुछ अटपटी-सी जरूर लग रही थी, थोड़ा बड़ी-बड़ी सी... जैसे इंटर फाइनल पढ़ने वाली लड़की-लेकिन उसकी खूबसूरती और शोखी में कोई कमी नहीं आई थी। मैंने कहा अच्छी लग रही हो, अब यही पहना करो। उसका गुस्सा उतार पर था, आँख मटकाते हुए बोली - भाभी और मम्मी पीछे पड़ी हैं।

अब तो पहनना ही पड़ेगा। अच्छा बताओ... सुनो इधर देखो। उसने दुपट्‍टा उतारकर हाथ में ले लिया। वह खिलखिलाते हुए मुड़ी। मैंने कहा, हे पागल, अगली बार से नंगे पैर मत आना चोरनी जैसे।

जाते-जाते वह रुक गई, सुनो मानिक बाबू, मैं तुमसे प्रेम करती हूँ... लव... लव करती हूँ... जैसे मुमताज राजेश खन्ना को, जैसे हेमा मालिनी धर्मेंद्र को करती है।

बाढ़ आई नदी को देखा है आपने? बौर से लदे पेड़ पर नजर गई है? बिना लगाम के घोड़े से पाला पड़ा है? कुछ ऐसा था उसके प्यार का आवेग - कुछ ऐसी थी उसके प्यार की लज्जत। बिना किसी से डरे, बिना किसी की परवाह किए वह मुझे प्रेम करती थी।

आप उसके अंगों की गोपनीयता से परिचित होंगे, लेकिन उसके मन के भेद कभी न जान पाएँगे। आपका सब कुछ... पर मेरा वह पहला चुंबन, वह बोसा, जो उसे चकित कर गया था... आपकी सभी प्रेम-क्रीड़ाओं पर भारी है। नहीं भूल सकती वह कभी उसे। फिर असीमित अनगिनत चुंबनों की उसकी चाह... मैं कैसे भूल सकता हूँ।

आप उससे कैसे मिले? आपको उससे आपकी जन्मपत्री ने मिलाया होगा या किसी बिचौलिये ने या फिर आपके परिवार वालों ने। हमें हमारी उम्र ने मिलाया था। हमें मौसमों ने मिलाया था, बादलों, बिजलियों, नदियों, तालों, पहाड़ों और सागरों ने मिलाया था। सड़कों, पगडंडियों, बाग-बगीचों ने मिलाया था। जाड़े-पाले, धूप-लू और सर्द हवाओं ने मिलीभगत की थी हमें मिलाने के लिए, चाँद सूरज तारों सितारों ने षडयंत्र किया था मुझे और उसे एक-दूसरे के करीब लाने के‍ लिए।

अपनी माँ से जब उसने कुछ पकाना सीखा तो सबसे पहले मुझे खिलाया था। उस जले व्यंजन का स्वाद और उसकी खुशबू आप क्या जानें! उसके हाथ का बुना पहला स्वेटर और मफरल मेरे हिस्से में आया। अपने जीवन का पहला प्रेम-पत्र उसने मेरे नाम लिखा था मैं उसे प्यार से बिल्ली कहता था।

क्या आपने भी उसे कोई प्यार का नाम दिया है? मुझे पता है कि जिस उम्र में आप उसे मिले हैं ऐसे में आपका शब्दकोश इन शरारतों के लिए नाकाफी है। आज वह आपके बच्चों को स्कूल भेजती है, उनका होमवर्क पूरा कराती है, अच्छे रिजल्ट के लिए दिन-रात एक कर देती है। उसे स्वयं पढ़ते-लिखते मैंने कभी नहीं देखा था... फेल होते-होते बची थी वह... कितनी ही बार स्कूल का नागा किया था उसने मेरी खातिर।

अगर मैं कभी नाराज हो जाता। उससे एक-दो दिन बात नहीं करता तो बस डबडबाई आँख लेकर छत की मुंडेरी से लगकर खड़ी रहती - दूसरी दिशा में ताकते।

कभी चिट्‍ठी लिखती है आपको? मुझे अपने खतों में बताया करती थी हवा कैसी बही... कौन-सा गाना सुनकर उदास हो गई, मैंने वो वाली शर्ट क्यों नहीं पहनी, ‍कि मैं बंगला मोड़ पर कल क्यों नहीं खड़ा था।

साड़ी और गहने में लदी-फँसी रखते हो उसको। कितना ढेर सारा पाउडर लीपती है चेहरे पर अब। क्या से क्या कर दिया तुमने मेरी जान को। उसकी बेलाग हँसी भी खा गए। कहाँ फेंक आए मेरी रानी के पुराने कपड़ों को। वो फ्रॉकें, वो स्कर्ट ब्लाउज... वो शर्ट और बेल बॉटम।

समीरा, देख रही हो मैं कितना बहक गया हूँ। तुम्हें खत लिखने बैठा था, तुम्हारे पति से दो-दो हाथ करने लगा। खत इतना लंबा हो गया है कि डर है कि तुम आधे पर ही मोड़कर रख दोगी। ऊपर से वह शेर... जो मैंने खत के शुरू में लिखा है। मूड तो तुम्हारा खराब होगा ही। लेकिन पेन बंद करने से पहले एक बात बताता चलूँ समीरा। मैंने जब तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हारी एक विचित्र-सी छवि मेरे मस्तिष्क में बनी थी। मैं किनारे वाले कमरे में बैठा था...

जिसकी खिड़की सड़क पर खुलती थी। हाथ में किताब लिए तुम किसी लड़की से बात कर रही थीं। कुछ ऊँची-सी, टाइट-सी फ्रॉक पहन रखी थी तुमने। फ्रॉक का ऊपर वाला हिस्सा सफेद और नीचे वाला हरा रंग का था... तुम्हें तो याद भी न होगा। तुम्हारी टाँगों का ज्यादा हिस्सा तुम्हारी फ्रॉक से बाहर था। मुझे याद पड़ रहा है कि मुझे सबकुछ बहुत अच्छा लगा था। मैंने साथ वाले लड़के से पूछा, कौन है ये चिड़िया। समीरा... इस मुहल्ले में बस अकेली है... उसने कहा था।

जैसे ही तुम किताब हाथ में झुलाते खिड़की से सामने से गुजरी, वह बोला क्या चीज है। तुम सहसा धीरे हुई... पहले कनखियों से... फिर लगभग घूरते तुमने खिड़की के अंदर देखा और फिर बढ़ गई। अगर मैं सीधे शब्दों में कहूँ तो तुम्हारे अंदर मुझे आत्मविश्वास और स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा हुआ दिखाई पड़ा। बिना बोले ही तुमने अपनी आँखों से कह दिया था, बाहर होते तो तुम्हारी औकात तुम्हें बता देती... तुममें से कोई भी मेरे लायक नहीं है। याद पड़ रहा है कि मैंने मन ही मन कहा था, बोल्ड एंड ब्यूटीफुल! लड़कियों की एक डरपोक और शर्मीली इमेज मेरे दिमाग में थी। जो मैंने देखा वह उससे मेल नहीं खाया। सच मानो समीरा... मैं कुछ डर-सा गया। सोचने लगा... तुम इसी मुहल्ले में रहती हो... कहीं अकेले न टकरा जाओ... मेरी किसी बात को कमेंट न समझ बैठो।

पर पहली ही नजर में तुम मुझ पर मर मिटी थी, याद है? मैं सिर्फ पैंट पहने दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ क्रिकेट खेल रह था। मेरे बदन पर सिर्फ काले रंग का फुल पैंट था और कुछ नहीं। बस तुम्हारे मुंडेर के नीचे ही हम खेल रहे थे। कहीं से अचानक एक आवाज आई - मीठी लेकिन तेज... आदेशात्मक स्वर... ऐ लड़के शर्ट पहनो! पहले तो मैं कुछ समझा नहीं... फिर मेरे नन्हे खिलाड़ी दोस्त ने हँसते हुए ऊपर की ओर इशारा किया वहाँ गुड़िया दीदी। मेरे मुड़ते ही तुम मुंडेर के नीचे बैठ गईं। बस समीरा... अब उसके आगे की सारी बातें जो धीरे-धीरे मेरे और तुम्हारे बीच हुईं...

तुम्हें याद आ गई होंगी। और वह त्योहार का दिन... याद आया? अच्‍छा बताओ, तुम्हारा आत्मविश्वास, तुम्हारा स्वाभिमान, तुम्हारा वह खिड़की से घूरना, तुम्हारी बोल्डनेस... कहाँ गायब हो गई थी जब तुमने मुझे देखा। देखती ही रहती थी... देखने के कितने बहाने... कितनी जगहें खोज लेती थीं तुम। कैसे-कैसे पत्र लिखती थीं तुम... लगता नहीं था मेरी बोल्ड एंड ब्यूटीफुल इतनी रोमांटिक है अंदर से।

लाख न चाहते हुए भी खत लंबा होता जा रहा है। अच्छा बताओ, हमारी आखिरी मुलाकात तुम्हें याद है? जब आखिरी बार तुम मेरे कमरे में आई थी... फाइनल परीक्षाओं के बाद जब मैं जा रहा था, जब हम अलग हो रहे थे, तुम मुझसे लगकर कितना-कितना रोई थीं। जिस तरह से तुम मुझसे लगी थी, मालूम पड़ता था जैसे तुम्हारे अंदर कोई वजन ही नहीं है। एकदम हल्की गुड़िया जैसा था तुम्हारा स्पर्श और तुम्हारा आलिंगन। भिगो दिया था तुमने मेरी शर्ट के ऊपरी हिस्से को।

कुछ देर बाद मैंने तुम्हें अपने से अलग किया और कहा - मुँह धो लो और घर चली जाओ। तुम्हें जाने क्या सूझा। चेहरे पर हँसी। हँसी नहीं, छोटी-सी मुस्कराहट - तुम्हारे घर चलूँ? दिल कहता है यहाँ न रहूँ तुम्हारे साथ चली चलूँ। मैं अपनी किताबें समेटक बक्से में रख रहा था। मैं चाह रहा था तुम्हारा ध्यान बँट जाए और तुम मुझसे हल्की-फुल्की दूसरी बातें करने लग जाओ।

ये लो व्याकरण और निबंध की किताब, रटती रहना, मेरी याद नहीं आएगी। कुछ देर बाद मैंने कनखियों से देखा। किताब थामे रूआँसी तुम छत को ताके जा रही थीं। तुम्हारी बुदबुदाहट को मैंने साफ सुना - क्यूँ आए थे यहाँ, न आते।

तुम्हारे बिना ही ठीक था। फिर कुछ देर की चुप्पी। मैंने अपनी रबड़ की चप्पलें कागज में लपेटकर बक्से में घुसा दी। अब कब आओगे, तुमने निबंध की किताब वापस बक्से में रखते हुए पूछा। फिर तुमने खुद ही जवाब भी दे दिया -
नहीं आना अब... हाँ.. जाओ खूब मन लगाकर पढ़ना। यहाँ तो मेरी वजह से तुम्हारा बड़ा नुकसान हुआ। मुझे याद नहीं पड़ रहा है कि इस पर मैंने क्या कहा। मेरी बस का समय हो गया था। रिक्शा बाहर खड़ा था। कमरे में उदासी और चुप्पी के अलावा हम और तुम थे।

मैंने बक्सा उठाया और बाहर निकलने को हुआ। तुमने एक पोटली बढ़ाते हुए कहा - यह भी लेते जाओ - अपना स्वेटर और मफलर। जाड़ों में शुरू किया था, अब जाकर पूरा हुआ। छुपा-छुपाकर बीनती थी...। कुछ देर तक तो मैं तुम्हें देखता रहा, फिर मुझे हँसी आ गई। मई जून के महीने में स्वेटर और मफलर का गिफ्‍ट। इतने सालों बाद मुझे अच्छी तरह याद है कि फिर मैंने क्या कहा और क्या किया। मैंने कहा, तो मैं सबको बता देता हूँ कि मानिक पागल है... समीरा की ही तरह। मैंने एक झटके में शर्ट के ऊपर स्वेटर पहना, मफलर को गले में फँसाया और रिक्शे में बैठ गया। बंगला मोड़ पर पहुँच कर जब आखिरी बार मैंने तुम्हें देखा तो तुम तेज कदमों से अपने घर की ओर चली जा रही थीं। समीरा, अँधेरे कमरे में बैठे-बैठे देखो शाम हो आई।

मेरा पूरा सीना, जहाँ तुमने सिर रखकर आँसू बहाया था, तरबतर है। वह दृश्य मुझे हलका और बेदाग बना रहा है। मेरा अँधेरा कमरा खिल उठा है। लाखों चिराग एक साथ रोशन हो उठे हैं। हर चिराग में तुम झिलमिलाती नजर आ रही हो... अपना पहला-पहला सलवार सूट पहने, हँसते खिलखिलाते... फिर दुपट्‍टे को हाथ में लेकर... मुझे रिझाते।

यह सब लिखने के बाद कुछ अजीब-सी कैफियत हो रही है मेरी। ऐसी जज्बाती बचकानी बातें कलमबंद करके सच पूछो तो मैं खुद को काफी कमतर पा रहा हूँ।

अँगरेजी में एक शब्द है 'इमबैरेस्ड'... बस ऐसा ही फील कर रहा हूँ। कुछ-कुछ शर्मिंदा-सा। कैसी ओछी बातें मैंने लिख दी हैं। कुल पागलपन जैसा नहीं लगता...? हाँ! तुम सोच रही होगी आखिर इस आदमी के पास कितनी फुर्सत है... कोई कामधाम नहीं जो प्यार मुहब्बत की बातें लेकर बैठ गया। कब की... कौन सी बात? अब याद कमरता फिर रहा है। बनावटी मजनूँ।

मुझे महसूस हो रहा है कि तुम मेरा पत्र पढ़कर मेरा मजाक उड़ाओगी। और अपने धीरे-गंभीर पति को हँस-हँसकर पढ़ाओगी। तुम सोच रही होगी कि भद्र शालीन महिलाओं से कैसे पेश आते हैं, नहीं सीख सका यह मजनूँ। क्या उसकी पत्नी किसी और को चाहती है।

क्या उसके बच्चे बड़े नहीं हुए। क्या वह इतना कमजोर रह गया कि सोलह-सत्रह साल की उम्र में देखादेखी को इतने सालों बाद प्रेम और बिछोह का जामा पहनाकर सहानुभूति हासिल करना चाहता है। कैसा घटिया रूमानी दोयम दर्जे का प्रेम-पत्र लिखा है इस आदमी ने! सचमुच मैं यही सोचकर शर्मिंदगी और बेचारगी से सराबोर हूँ। तुम मेरी खिल्ली उड़ा रही हो... सरेआम मेरा मजाक बना रही हो... और मुझे इसी बात का डर था।

फिर पत्र को अपने पति की ओर बढ़ा देती हो। वे भी हँस रहे हैं। बड़े जिंदादिल और खुले दिमाग के आदमी हैं। मेरी तरह ईर्ष्यालु और दकियानूस नहीं। वह भी हँस-हँसकर लोटपोट हो रहे हैं। तुम दोनों लोटपोट हो रहे हो। तुम्हारे बच्चे भी लोटपोट हो रहे हैं। तुम पत्र की कुछ खास पंक्तियों पर उँगली रखती हो और अपने पति को दिखाती हो और हँसते-हँसते अपना सर उनके कंधे पर रख देती हो।

लेकिन श्रीमती समीरा, मैं अभी भी सिर्फ यही सोच रहा हूँ हम कहीं क्यों जाते हैं? कौन ले जाता है हमें? किसी के पड़ोस में हम क्यों रहने लगते हैं? क्यों बिना वजह कोई हमें अच्छा लगने लगता है? फिर क्यों हम बड़े हो जाते हैं?

मुझे अच्छा लगा कि तुम मुझे पहचान गई समीरा। आखिर पढ़ाई-लिखाई, कॉपी-किताब भूलकर प्रेम किया था हमने एक-दूसरे से। दुनिया जिसे फर्स्ट लव कहती है, वह सबके नसीब में कहाँ होता है? उसके बाद क्या हुआ क्या नहीं हुआ, इसका रोना क्यों रोएँ। तो थोड़ा हँसा दूँ तुम्हें। मैं कितना हँसाया करता था तुम्हें! पत्र की शुरुआत मैंने एक शेर से की थी। अंत भी एक शेर से करना चाहता हूँ। समीरा डोंट माइंड। जानती हो मैं हूँ ही ऐसा। वैसे भी तुम्हारे पति महोदय ने गाड़ी न रोककर अच्छा नहीं किया। तो शेर अर्ज है -
तुम मेरा प्रेम-पत्र पढ़कर कहीं नाराज न होना।
अपने खूसट पति से डरकर कहीं फाड़ न देना।

बस तुम्हारा मानिक उर्फ मनु

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