क्यों खून से सनी है बंगाल की सियासत

मंगलवार, 5 जून 2018 (11:29 IST)
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले में हाल में चार दिनों के भीतर बीजेपी के दो कार्यकर्ताओं की मौत की घटनाएं लगातार सुर्खियां बटोर रही हैं। लेकिन इस हिंसा के बीज बहुत गहरे हैं।


ताजा राजनीतिक हिंसा ने सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर भी तेज कर दिया है। यह दोनों राजनीतिक हत्याएं हैं या नहीं, इस पर विवाद हो सकता है। लेकिन पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हत्याएं और हिंसा का इतिहास नया नहीं है।
 
 
बीते लगभग पांच दशकों के दौरान यह राजनीतिक बर्चस्व की लड़ाई में हत्याओं और हिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया गया है। इस दौरान सत्ता संभालने वाले चेहरे जरूर बदलते रहे, लेकिन उनका चाल-चरित्र रत्ती भर भी नहीं बदला। मशहूर बांग्ला कहावत 'जेई जाए लंका सेई होए रावण' यानी जो लंका जाता है वही रावण बन जाता है। इसी तर्ज पर सत्ता संभालने वाले तमाम दलों ने इस दौरान इस हथियार को और धारदार ही बनाया है।
 
 
अब राज्य के लोग भी इसके आदी हो चुके हैं। मोटे अनुमान के मुताबिक, बीते छह दशकों में राज्य में लगभग साढ़े आठ हजार लोग राजनीतिक हिंसा की बलि चढ़ चुके हैं। इस दौरान यह राज्य इस मामले में देश के शीर्ष तीन राज्यों में शुमार रहा है। सत्तर-अस्सी के दशक की हिंदी फिल्मों की कहानियों की तरह खून का बदला खून की तर्ज पर यहां खूनी राजनीति का जो दौर शुरू हुआ था उसकी जड़ें अब काफी मजबूत हो चुकी हैं।
 
 
आजादी के बाद से ही
कभी ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश शासकों का प्रिय रहा बंगाल देश के विभाजन के बाद से ही हिंसा के लंबे-लंबे दौर का साक्षी रहा है। विभाजन के बाद पहले पूर्वी पाकिस्तान और बाद में बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों के मुद्दे पर भी बंगाल ने भारी हिंसा झेली है। वर्ष 1979 में सुंदरबन इलाके में बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के नरसंहार को आज भी राज्य के इतिहास के सबसे काले अध्याय के तौर पर याद किया जाता है। उसके बाद इस इतिहास में ऐसे कई और नए अध्याय जुड़े।
 
 
दरअसल, साठ के दशक में उत्तर बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हुए नक्सल आंदोलन ने राजनीतिक हिंसा को एक नया आयाम दिया था। किसानों के शोषण के विरोध में नक्सलबाड़ी से उठने वाली आवाजों ने उस दौरान पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। नक्सलियों ने जिस निर्ममता से राजनीतिक काडरों की हत्याएं की, सत्ता में रही संयुक्त मोर्चे की सरकार ने भी उनके दमन के लिए उतना ही हिंसक और बर्बर तरीका अपनाया।
 
 
वर्ष 1971 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद तो राजनीतिक हत्याओं का जो दौर शुरू हुआ उसने पहले की तमाम हिंसा को पीछे छोड़ दिया। वर्ष 1971 से 1977 के बीच कांग्रेस शासनकाल के दौरान राज्य में विपक्ष की आवाज दबाने के लिए इस हथियार का इस्तेमाल होता रहा। वर्ष 1977 के विधानसभा चुनावों में यही उसके पतन की भी वजह बनी। उसके बाद बंगाल की राजनीति में कांग्रेस इस कदर हाशिए पर पहुंची कि अब वह राज्य की राजनीति में अप्रासंगिक हो चुकी है।
 
 
लेफ्ट फ्रंट का दौर
वर्ष 1977 में भारी बहुमत के साथ सत्ता में आए लेफ्ट फ्रंट ने भी कांग्रेस की राह ही अपनाई। दरअसल, लेफ्ट ने सत्ता पाने के बाद हत्या को संगठित तरीके से राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू किया। वैसे, सीपीएम काडरों ने वर्ष 1969 में ही बर्दवान जिले के सेन भाइयों की हत्या कर अपने राजनीतिक नजरिए का परिचय दे दिया था। वह हत्याएं बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सेनबाड़ी हत्या के तौर पर दर्ज है। वर्ष 1977 से 2011 के 34 वर्षों के वामपंथी शासन के दौरान जितने नरसंहार हुए उतने शायद देश के किसी दूसरे राज्य में नहीं हुए।
 
वर्ष 1979 में तत्कालीन ज्योति बसु सरकार की पुलिस व सीपीएम काडरों ने बांग्लादेशी हिंदू शरणार्थियों के ऊपर जिस निर्ममता से गोलियां बरसाईं उसकी दूसरी कोई मिसाल नहीं मिलती। जान बचाने के लिए दर्जनों लोग समुद्र में कूद गए थे। अब तक इस बात का कहीं कोई ठोस आंकड़ा नहीं मिलता कि उस मरीचझांपी नरसंहार में कुल कितने लोगों की मौत हुई थी। उसके बाद अप्रैल, 1982 में सीपीएम काडरों ने महानगर में 17 आनंदमार्गियों को जिंदा जला दिया था।
 
 
इसी तरह जुलाई, 2000 में बीरभूम जिले के नानूर में पुलिस ने राजनीतिक आकाओं की शह पर जबरन अधिग्रहण का विरोध करने वाले कांग्रेस समर्थक 11 अल्पसंख्यक लोगों की हत्या कर दी थी। उसके बाद 14 मार्च, 2007 को नंदीग्राम में अधिग्रहण का विरोध कर रहे 14 बेकसूर गांव वाले भी मारे गए।
 
 
तृणमूल कांग्रेस का दौर
नंदीग्राम और सिंगुर की राजनीतिक हिंसा और हत्याओं ने सीपीएम के पतन का रास्ता साफ किया था। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2009 में राज्य में 50 राजनीतिक हत्याएं हुई थीं और उसके बाद अगले दो वर्षों में 38-38 लोग मारे गए। यह लेफ्ट फ्रंट सरकार के उतार और तेजी से उभरती तृणमूल कांग्रेस के सत्ता की ओर बढ़ने का दौर था। वर्ष 2007, 2010, 2011 और 2013 में राजनीतिक हत्याओं के मामले में बंगाल पूरे देश में अव्वल रहा।
 
 
वर्ष 2011 में ममता बनर्जी की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद भी राजनीतिक हिंसा का दौर जारी रहा। दरअसल, लेफ्ट के तमाम काडरों ने धीरे-धीरे तृणमूल का दामन लिया था। यानी दल तो बदले लेकिन चेहरे नहीं। अब धीरे-धीरे बीजेपी के सिर उभारने के बाद एक बार फिर नए सिरे से राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ है।
 
 
मई में पंचायत चुनावों की हिंसा के दौरान दर्जनों लोग मारे गए। लेकिन तृणमूल कांग्रेस ने यह कहते हुए इस हिंसा का बचाव किया था कि लेफ्ट फ्रंट के शासनकाल में होने वाले पंचायत चुनावों में पार्टी के चार सौ से ज्यादा कार्यकर्ता मारे गए थे।
 
 
वजह
आखिर बंगाल में लगातार तेज होने वाली इस हिंसा की वजह क्या है? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजनीति सबसे फायदेमंद धंधा बन गई है जिसके चलते खासकर ग्रामीण स्तर पर चुनावों में जीत कर सत्ता पर पर काबिज होने की बढ़ती हवस ही इसकी मूल वजह है। राजनीतिक विश्लेषक कंचन चंद्र कहते हैं, "किसी दूसरे पेशे में शुरुआती स्तर पर होने वाले फायदों के मुकाबले राजनीति में शुरुआती स्तर पर निर्वाचित पदों पर होने वाली आय, स्टेट्स और सत्ता की ताकत बहुत ज्यादा है।"
 
 
वह बताते हैं कि विभिन्न विकास परियोजनाओं और केंद्रीय परियोजनाओं के मद में सालाना मिलने वाले हजारों करोड़ की रकम में से मिलने वाले मोटे कमीशन के लालच ने राजनीति को एक आकर्षक पेशा बना दिया है। यही वजह है कि चुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सबका सहारा लिया जाता है। ऐसे में राजनीतिक हिंसा ही सबसे धारदार व असरदार हथियार साबित होती है।
 
 
एक अन्य राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "राजनीतिक हिंसा के मामले में भले तमाम राजनीतिक दल अपनी कमीज को बेदाग होने का दावा करें, कोई भी दूध का धुला नहीं है। सबके हाथ खून से सने हैं।"
 
 
पर्यवेक्षकों का कहना है कि बंगाल की राजनीति में पांच दशकों से भी लंबे समय से इस असरदार हथियार की मारक क्षमता लगातार तेज हो रही है। अगले साल होने वाले आम चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों को देखते हुए इस हिंसा की आग और भड़कने होने का अंदेशा है।
 
रिपोर्ट प्रभाकर, कोलकाता

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