असम में हजारों परिवारों के बिखरने का खतरा

शनिवार, 7 जुलाई 2018 (11:42 IST)
सांकेतिक चित्र
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) के मुद्दे पर असम में लाखों अल्पसंख्यकों की नींद गायब हो गई है। इससे हजारों परिवारों के बिखरने का खतरा पैदा हो गया है।
 
सुप्रीम कोर्ट ने पहले मसविदे में शामिल लगभग डेढ़ लाख नामों को अंतिम मसौदे से हटाने की अनुमति दे दी है। इससे राज्य में आशंका गहरा रही है। पहले अंतिम मसौदा 30 जून को प्रकाशित होना था। लेकिन राज्य में बाढ़ की हालत को ध्यान में रखते हुए संबंधित अधिकारियों की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी समयसीमा 30 जुलाई कर दी है।
 
 
एनआरसी में जिनके नाम नहीं होंगे उनको विदेशी घोषित कर असम से बाहर निकाल दिया जाएगा। इस बीच, केंद्र सरकार ने अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद हिंसा के आशंका के मद्देनजर राज्य में सुरक्षा की परिस्थिति की समीक्षा की है।
 
 
विवाद और अंदेशा
असम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर और उसकी निगरानी में वर्ष 2015 में एनआरसी को अपडेट करने का काम शुरू हुआ था। दो साल से भी लंबे समय तक चली जटिल कवायद के बाद बीते साल 31 दिसंबर को एनआरसी के मसौदे का प्रारूप प्रकाशित किया गया था जिसमें 3.29 करोड़ में से 1.9 करोड़ नाम ही शामिल थे।
 
 
अब अंतिम सूची के प्रकाशन से पहले ही एनआरसी प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में यह कह कर खासकर अल्पसंख्यकों में आतंक फैला दिया है कि पारिवारिक इतिहास और वंशवृक्ष की पुष्टि नहीं होने की वजह से पहले मसौदे में शामिल लगभग डेढ़ लाख नामों को अंतिम मसौदे से हटा दिया गया है। इनमें 48,456 महिलाओं के नाम भी शामिल हैं।
 
 
इनमें से ज्यादातर ऐसी हैं जिनकी शादी दशकों पहले हो चुकी है और अब उनके नाती-पोते भी जवान हो चुके हैं। लेकिन एनआरसी प्राधिकरण का दावा है कि उन महिलाओं ने पंचायत का जो प्रमाणपत्र दिया था उससे उनकी नागरिकता की पुष्टि नहीं होती है। इनमें से कई महिलाएं देश के दूसरे राज्यों से भी यहां आकर बसी हैं।
 
 
एनआरसी के संयोजक प्रतीक हाजेला बताते हैं, "पारिवारिक इतिहास का पता नहीं होने की वजह से पहले मसविदे से डेढ़ लाख लोगों के नाम हटाए जाएंगे। इन तमाम लोगों के असम में आने या यहां का नागरिक होने के कोई पुख्ता प्रमाण नहीं मिले हैं।" हाजेला के मुताबिक, अंतिम मसौदे में जिनके नाम शामिल नहीं होंगे उनको बाद में भी अपना दावा पेश करने का मौका मिलेगा।
 
 
पहले एनआरसी की अंतिम सूची का प्रकाशनन बीते 30 जून को होना था। लेकिन राज्य के कई जिले बाढ़ की चपेट में होने की वजह से एनआरसी प्राधिकरण की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी तारीख 30 जुलाई तय की है। बीते साल पहले मसौदे के प्रकाशन के बाद से ही लाखों परिवार आतंक में दिन गुजार रहे हैं।
 
 
निचले असम के ग्वालपाड़ा जिले के केशव देबनाथ (67) भी ऐसे लोगों में शुमार हैं। पहले मसौदे में उनके परिवार के बाकी लोगों के नाम तो शामिल थे लेकिन पत्नी मालती का नाम उसमें नहीं था। केशव कहते हैं, "मालती ने कभी स्कूल में पढ़ाई नहीं की है। हमारी शादी वर्ष 1961 में हुई थी। मैंने पंचायत सचिव से लेकर इस आशय का एक प्रमाणपत्र जमा किया है। देखें, क्या होता है?"
 
 
उनका कहना है कि अगर अंतिम मसौदे में पत्नी का नाम शामिल नहीं हुआ तो पूरा परिवार ही बिखर जाएगा। वह सवाल करते हैं, "अगर मेरी पत्नी को बांग्लादेशी करार दिया गया तो क्या होगा?" देबनाथ जैसे हजारों लोगों को इसी बात का डर सता रहा है।
 
 
एनआरसी के प्रावधानों के मुताबिक, एनआरसी में नाम शामिल करने के लिए वंशवृक्ष की पुष्टि के दौरान विवाहित महिला को अपने पिता-माता से संबंध का कोई पुख्ता प्रमाण देना होता है। लेकिन खासकर असम के ग्रामीण इलाकों में हजारों महिलाओं के सामने समस्या यह है कि वे न तो कभी स्कूल गई हैं और न ही उनके विवाह का रजिस्ट्रेशन कराया गया था। नतीजतन उनके पास कोई ठोस प्रमाणपत्र नहीं हैं।
 
 
राजधानी गुवाहाटी के एक वकील सैयद बुरहानुर रहमान कहते हैं, "किसी परिवार की महिला का नाम एनआरसी में शामिल नहीं होने की हालत में पूरा परिवार गहरे संकट में फंस जाएगा।" उनका सवाल है कि तमाम उपलब्ध कागजात तो पहले ही सौंपे जा चुके हैं। अब यह महिलाएं दूसरे सबूत कहां से लाएंगी? रहमान कहते हैं, "असम में बड़े पैमाने पर परिवारों के टूटने-बिखरने का खतरा मंडरा रहा है। इन महिलाओं को एक बार फिर अग्निपरीक्षा से गुजरना होगा।"
 
 
बढ़ती चिंता
अंतिम मसौदे के प्रकाशन से पहले कानून और व्यवस्था की स्थिति बनाए रखने के लिए राज्य सरकार ने हालांकि केंद्रीय बलों की तैनाती के जरिए सुरक्षा का मजबूत इंतजाम कर दिया है। लेकिन राज्य के विभिन्न संगठनों ने मौजूदा परिस्थिति पर गहरी चिंता जताई है।
 
 
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी एक उच्च-स्तरीय बैठक में असम की परिस्थिति की समीक्षा की है। राज्य के ताकतवर छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) के सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्य कहते हैं, "सरकार को त्रुटिहीन एनआरसी के मुद्दे पर कोई समझौता नहीं करना चाहिए। इसमें अवैध रूप से राज्य में आने वाले एक भी बांग्लादेशी का नाम शामिल नहीं होना चाहिए।"
 
 
दूसरी ओर, कृषक मुक्ति संग्राम समिति के नेता अखिल गोगोई आरोप लगाते हैं, "सरकार एनआरसी के मुद्दे को बेवजह तूल देकर राज्य में आतंक पैदा करने का प्रयास कर रही है। पहले लोगों में इसे लोकर कोई आशंका नहीं थी। लेकिन सरकार की ओर से उठाए गए कदमों के बाद राज्य में डर और आतंक का माहौल पैदा हो गया है।" उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर सुरक्षा व्यवस्था करने की कोई जरूरत नहीं थी।
 
 
करीमगंज जिले के कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सिद्दीकी अहमद कहते हैं, "सरकार असम में म्यांमार जैसे हालात पैदा करने का प्रयास कर रही है।" उनका कहना है कि सरकार इस मुद्दे पर ब्रहमपुत्र और बराक घाटी के बीच पहले ही मतभेद पैदा कर चुकी है। अब एनआरसी के जरिए राज्य में रोहिंग्या शरणार्थियों जैसा संकट पैदा करने का प्रयास किया जा रहा है।
 
 
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि एनआरसी के अंतिम मसौदे के प्रकाशन से पहले राज्य के विभिन्न राजनीतिक दलों और संगठनों के बीच जहां बयानबाजी तेज होने का अंदेशा है। मसौदे के प्रकाशन के बाद पैदा होने वाली स्थिति से निपटना असम की बीजेपी सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती होगी।
 
रिपोर्ट प्रभाकर, कोलकाता
 

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