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क्या भूटान के राजकुमार का हुआ है पुनर्जन्म, जानें अनोखा रहस्य...

हमें फॉलो करें क्या भूटान के राजकुमार का हुआ है पुनर्जन्म, जानें अनोखा रहस्य...
पुनर्जन्म एक सच है ऐसा करोड़ों लोगों के मन में विश्वास है। पुनर्जन्म से जुड़ी कई घटनाएं आपने पढ़ी, सुनी या देखी होगी। वर्तमान में एक नया मामला सामने आया है जो कि अनोखा है। भूटान और भारत के रिश्ते प्राचीनकाल से रहे हैं। भूटान की महारानी दोरजी वांगुक के यहां नाती का जन्म हुआ है। नाती के रूप में जन्मे इस छोटे से बच्चे ट्रुएक जिग्मे जिंगतेन वांगचुक का प्राचीन भारत की नालंदा यूनिवर्सिटी से कोई जुड़ावा है। ऐसा माना जा रहा है कि यह बच्चा 824 साल पहले नालंदा में रह चुका है।
भूटान में पुनर्जन्म को लेकर मान्यताएं बहुत मजबूत हैं और यह भी माना जाता है कि पूर्वजन्म में जिग्मे का सारनाथ से गहरा नाता रहा। भूटान के इस छोटे से राजकुमार का दावा अगर सच निकला तो यह माना जाएगा कि नालंदा के एक प्रोफेसर का ही जन्म भूटान के राजकुमार के रूप में हुआ है। भूटान की महारानी कहती हैं कि पिछले तीन साल से उनके नाती ने जो कुछ बताया उसे जानकर वह हैरान रह गई।
 
पहले तो इसकी बात को घर के लोगों के दरकिनार किया लेकिन जब यह बच्चा अड़ा रहा तो घर के लोगों ने इसे गंभीरता से लिया और उसकी बातों को ध्यान से सुना। भिक्षु येरो ने बताया कि जिग्मे जब थोड़ा बहुत बोलने लगा तब वो नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में ही बात करता था। जिग्मे ने 824 वर्ष पूर्व नालंदा में पढ़ने की बात बताई। उसकी हर बात 824 वर्ष पूर्व के शिक्षाविद् वेरोचना से मिलती थी। जिग्मे अक्सर अपनी नानी से सारनाथ आने की इच्छा जताता था। उसकी बातों को सुनकर महारानी ने बुद्ध से जुड़े स्थलों के दर्शन का निर्णय लिया और फिर चमत्कार हुआ...अगले पन्ने पर...
फोटो सौजन्य : यूट्यूब 
 

नालंदा को देखकर अति प्रसंन्न हो गया राजकुमार : जिग्मे जो जब नालंदा ले जाया गया तो चमत्कार हो गया। वह उसे ऐसे देख रहा था जिसे वह उसी का घर हो या जैसे उसका सपना नालंदा विश्वविद्यालय में आकर सच साबित हुआ हो। यहां प्राचीन नालंदा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रहे वेरोचना की पहचान भूटान के 3 साल के मासूम राजकुमार के रूप में हुई। 
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इस राजकुमार ने सिर्फ चार घंटे में ही खंडहर बन चुके नालंदा विश्वविद्यालय की दरों-दीवार को पहचान लिया। जिग्मे की बातों और भाव-भंगिमाओं पर विश्वास करें तो वह आज से 824 साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय में बतौर स्कॉलर रह चुका है। उस दौर में उसे शिक्षाविद वेरोचेना के रूप में जाना जाता था और 824 साल बाद वह भूटान की महारानी के नाती के तौर पर पैदा हुआ है। इतना ही नहीं इस छोटी उम्र में उसे नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में काफी कुछ पता है और वह अपने रहने वाले कमरे तक खुद ही पहुंच गया। उसकी इस हरकत से लोग स्तब्ध हैं।
 
दरअसल, करीब तीन वर्ष का वह मासूम राजकुमार नालंदा को देखकर प्रफुल्लित हो उठा। मानो कोई अधूरी इच्छा पूरी हो गई हो। सारनाथ के पुरातात्विक खंडहर परिसर, चौखंडी स्तूप, धमेख स्तूप को कभी गंभीरता से देखता, कभी हंस देता। भगवान बुद्ध की प्रतिमा को देखते ही उसके शांत मुखमंडल पर खुशी की लकीरें खिंच गईं। जिग्मे नालंदा विश्वविद्यालय के चप्पे-चप्पे से वाकिफ है। जब वह नालंदा गया तो अपने कमरे तक पहुंच गया जहां पूर्वजन्म में रहता था। इतना ही नहीं, वहां उसने वह मुद्राएं दिखाईं जो नालंदा के छात्रों को सिखाई जाती थीं। 
 
राजकुमार जिग्मे अपनी नानी और भूटान की महारानी आशी दोरजी वांग्मो वांगचुक, उनकी पुत्री आशी सोनम देक्षेन वांगचुक व राजपरिवार के जिग्से वांगचुक के साथ शुक्रवार को सारनाथ में था। इसके पूर्व महारानी ने अपने पूरे परिवार व 16 सदस्यीय दल के साथ सारनाथ का भ्रमण किया।

जिम्मे की नानी और भुटान की महारानी ने कहा कि 'मेरे साथ मेरा नाती आया है यहां पहली बार...मैं समझती हूं कि ये मेरे लिए बेहद खास दिन है...क्योंकि, ये पुनर्जन्म है वेरोचन का...जो नालंदा यूनिवर्सिटी के शिक्षाविद थे...वो यहां पढ़े थे, जो दुनिया की सबसे पुरातन और महान यूनिवर्सिटी में से एक है...और मेरे नाती ने इस यूनिवर्सिटी को पहचान लिया है...उसने कहा कि ये जगह अब खंडहर हो चुकी है...मेरे नाती ने बताया कि वह यहां पढ़ा था...नालंदा यूनिवर्सिटी के तमाम रास्ते उसे याद हैं..उसने बताया कि वो कहां बैठता था...कौन सी चीज कहां पर थी? ये सारी बातें हमारे लिए चौंकाने वाली हैं...मैं इस यात्रा में हो रही चीजोां को अपनी जिंदगी और अपने नाती के लिए सबसे खास दिन के रूप में देखती हूं...
 
पुरातात्विक खंडहर परिसर गईं जहां संरक्षण सहायक पीके त्रिपाठी ने इस शाही परिवार का स्वागत किया। इसके बाद महारानी ने धमेख स्तूप के समक्ष बैठकर पूजा की। मूलगंध कुटी बौद्ध मंदिर में महाबोधि सोसायटी आफ इंडिया के सहायक सचिव भिक्षु मेघानकर ने भी पूजा कराई। चौखंडी स्तूप में अपनी नानी के साथ जिग्मे ने भी पूजा की। यहां के हर स्थान को वह ध्यान से देख रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वह कुछ जानने की कोशिश कर रहा हो। दल के साथ बोधगया भूटान बौद्ध मठ से आए भिक्षु येरो ने बताया कि जिग्मे जब थोड़ा बहुत बोलने लगा तब वो नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में ही बात करता था।
 
गौरतलब है कि तक्षशिला के बाद नालंदा विश्वविद्यालय दुनिया का सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय है। इसकी स्थापना 450 ई. में गुप्त वंश के शासक कुमार गुप्त ने की थी। इनके बाद हर्षवर्द्धन, पाल शासक और विदेशी शासकों ने विकास में अपना पूरा योगदान दिया। गुप्त राजवंश ने मठों का संरक्षण करवाया। 1193 ई. में आक्रमणकारी बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को तहस-नहस कर जला डाला था। इस विश्वविद्यालल को बचाने के लिए 10 हजार भिक्षुओं ने बलिदान दिया लेकिन वे सभी मारे गए। यह दुनिया का पहला आवासीय महाविहार था, जहां 10 हजार छात्र रहकर पढ़ाई करते थे और इन्हें पढ़ाने के लिए 2000 शिक्षक होते थे।

चित्र सौजन्य : यूट्यूब

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