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64 वर्षों में क्या खोया, क्या पाया?

विशाल मिश्रा

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देश आजादी की 65वीं वर्षगांठ मनाने जा रहा है। महंगाई, भ्रष्टाचार, थोकबंद घोटाले, विदेशों में जमा अकूल कालाधन समेत कई ज्वलंत मुद्दे मुंहबाए खड़े हैं। लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री झंडा फहराएंगे और देश के कई मंत्री और जिम्मेदार पदों पर रह चुके गणमान्य नागरिक तिहाड़ जेल में बंद अपनी पेशी या पूछताछ की तारीख का इंतजार कर रहे होंगे।

केंद्र सरकार का भ्रष्टाचार उजागर करता विपक्ष जो कि राज्यों में आसीै, वह भी दूध का धुला नहीं है। कार्रवाई के नाम पर मंत्रियों, मुख्‍यमंत्रियों को बदल भी दिया गया तो इस बात की क्या ग्यारंटी रहती है कि आने वाला वह सब नहीं करेगा जोकि उसके पूर्ववर्ती ने किया। इन करणधारों पर हमने भरोसा करके शासन की बागडोर सौंपी है इनमें से आटे में नमक बराबर की संख्‍या ईमानदारों की है।

लोकसभा चुनाव परिणामों के बाद देश ने जो जनाधार केंद्रीय प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को दिया और मजबूत विपक्ष सदन में बैठा। तो लोगों को शासन के ठीक ढंग से चलने की उम्मीद थी लेकिन विपक्ष अपनी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर सका। महंगाई के लिए हुई बहस में तो वाम दलों ने यहां तक आरोप लगाए कि सत्ता पक्ष और विपक्ष (एनडीए) एक हो गए हैं।

बैलेट के जरिये चुनकर सरकार बनी वहां तक तो लोकतंत्र था। लेकिन जब वही जनता आंदोलन करने के लिए देश में किसी जगह एकत्र होना चाहती है तो वहां सरकार को कानून स्थिति बिगड़ने की चिंता सताने लगती है।

जिम्मेदार व्यक्तियों का इस्तीफा मांगना आम बात हो गई है। कहीं लाठीचार्ज हुआ नहीं, पुलिस से चूक हुई। सीधे गृहमंत्री का इस्तीफा मांगा जाता है। मंत्रियों की गलती के पीछे प्रधानमंत्री से इस्तीफा मांगेंगे। वर्ष में अनगिनत बात इन इस्तीफों की मांग चलती रहती है और उतनी ही बार ठुकरा भी दी जाती है।

सब रामभरोसे। या तो सभी कुछ गड़बड़ लगता है या फिर थोड़ी सी भी लोकतंत्र के प्रति आस्था रखें तो सभी कुछ ठीक चल रहा है। पश्चिम बंगाल, असम में हुए विधानसभा चुनाव में 30 प्रतिशत से ज्यादा चुनकर आए विधायक आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं। 34 वर्षों में यदि मार्क्सवादियों के शासन से कहीं न कहीं असंतुष्ट रही जनता ने यदि शासन बदला भी है तो क्या उनके लिए खुशी जाहिर करें।

एक के फंदे से आपकी गर्दन निकली तो दूसरे ने जकड़ ली। जनता ने एक अयोग्की जगह दूसरे को चुन लिया। शिक्षित युवा वर्ग राजनीति की चर्चा ही नहीं करना चाहता। पेशे के रूप में या देश सेवा के उद्देश्य से जिन्होंनइसअपनायहोगवह भी अब धीरे-धीरे चुजानकी कगार पर हैं। संसद में आज भी बहुमत इन्हीं बुजुर्गों का है, मंत्रिमंडल में भी यही सफेद बाल वाले, मुरझाए चेहरे आपको ज्यादा मिलेंगे।

देश के लोकतंत्र को इन बुजुर्गों के अनुभव के साथ-साथ सबल और समर्थ कंधों की भी जरूरत है। तभी इस आजादी की रक्षा और आजादी का सदुपयोग बेहतर ढंग से किया जा सकता है।

हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि आजादी के बाद देश ने प्रत्येक क्षेत्र में उत्तरोत्तर विकास किया है लेकिन कुछ किंतु, परंतु के साथ तो क्यों न अब इन पर गौर कर इन्हें भी दूर कर दिया जाए।

आए दिन सरकारी अफसरों से लेकर चपरासी तक आय के ज्ञात स्रोतों से कई गुना अधिक धन मिलना। क्या कोई सरकारी विभाग दावा कर सकता है कि हमारा विभाग 100 फीसद भ्रष्टाचार से मुक्त है। स्वतंत्र भारत का स्वतंत्र नागरिक यह कौन सी आजादी की या गुलामी की कीमत चुका रहा है।

भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वालों को देश के 'मजाकिया नेता' कहते हैं कि इनकी हैसियत ही क्या है। वोट डालने के बाद संसद में भेजने के बाद यह चाहते हैं जनता 5 साल तक सोती रही जो जाग रहे हैं वे गलत हैं। इनके दल को जनता ने संसद और विधानसभा से तो बाहर का रास्ता दिखा दिया है। यदि इनकी सामंती सोच में सुधार नहीं हुआ तो हो सकता है ये आपको अगली लोकसभा से भी नदारद ही दिखें। इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र में जनता जनार्दन को जिसने भी हल्के में लिया उसे मुंह की खानी पड़ी है।

64 वर्षों में एक व्यक्ति कार्यशील जीवन का दो तिहाई हिस्सा समाप्त कर चुका होता है। तो एक बार जरूर विचार करें कि आजादी के इन 64 वर्षों में हमने क्या खोया? क्या पाया? अण्णा हजारे को आंदोलन के लिए शुभकामनाएं कि उनका आंदोलन व्य‍वस्थित रूप से मुकाम हासिल करे और देश के 'बुद्धिजीवी' नेताओं को सद्‍बुद्धि प्रदान करने में सहायक हो सके। जय हिंद।

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