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आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे

हमें फॉलो करें आओगे जब तुम ओ साजना, अंगना फूल खिलेंगे
- सुशोभित सक्तावत

फिल्‍म 'जब वी मेट' का ख़ूब जाना-पहचाना गीत है यह। उस्‍ताद राशिद ख़ान की पकी हुई, परती आवाज़ में गुंथा हुआ। उस्‍ताद राशिद ख़ान हिंदुस्‍तानी क्‍लासिकी संगीत के रामपुर-सहसवान घराने से ताल्‍लुक़ रखते हैं, जिसमें गायकी में 'चैनदारी' का बड़ा ज़ोर है। इत्‍मीनान के चरखे पर काता जाने वाला सूत। उस्‍ताद ने अपनी घरानेदार ख़ूबियों के साथ ही इस गीत को गाया है, तब भी अगर इसमें उनकी आवाज़ के परदे को हटाकर देखें तो पाएंगे कि उसके पीछे आंसुओं का झरना है और उस झरने को हटाकर देखें तो पाएंगे कि जलते हुए पहाड़ हैं और उन पहाड़ों को हटाकर देखें तो पाएंगे कि एक सिहरता हुआ सफ़ेद सूनापन है, और यह सिलसिला इसी तरह क़यामत तक चलता रह सकता है। इस गीत की शिद्दत ही कुछ ऐसी है।
 
फिल्‍म की कहानी में गहरे-भीतर तक रचा-बसा गीत है यह। यह रेट्रोस्‍पेक्‍ट में चलता है : चीज़ें जो घट चुकीं, लेकिन हमारी जानकारी के दायरे में नहीं थीं। यह अतीत की एक छूटी हुई कड़ी को जोड़ता है, और उस बीते हुए लम्‍हे का सिरा मौजूदा लम्‍हे तक लेकर आता है। आदित्‍य कश्‍यप अपनी गीत को दुनिया के आखिरी छोर पर छोड़ आया था, तब से जाने कितने चांद मोमबत्‍ती की तरह गल चुके, जाने कितने सूरज पिघलकर सोने की नदियों में बह गए, वो जगह अपने बीते कल और आज के रीतेपन को सहेजे, संजोए उसी तरह वहीं बिछली रहती है, रोशनी के लिहाफ़ के पीछे, हाथ भर बढ़ाकर छू लें, ऐसी, लेकिन हासिल करके भी कभी हासिल न कर सकें, ऐसी भी। वह आदित्‍य कश्‍यप और गीत के एक साथ जुड़ने और टूटने की ज़मीन है, सांझ-सकारे की संधिरेखा।
यह एक विदा-गीत है। एक अलविदा है। करुण प्रसंग, किंतु आश्‍चर्य, दोनों को ही इसका भान नहीं। कि आदित्‍य कश्‍यप को संतोष है कि गीत अपने मुकम्‍मल मुक़ाम पर जा रही है। कि गीत को ख़ुशी है कि आदित्‍य कश्‍यप ने उसे यहां तक पहुंचाने का अपना जिम्‍मा अच्‍छे-से निभा दिया। बात यहां ख़त्‍म हो जाती है, इससे आगे बढ़ने का अब कोई प्रसंग नहीं, ज़रूरत नहीं। लिहाज़ा, यह एक सदा‍शय विदा है, मुस्‍कराहटों के फूलों के साथ। कि तभी गीत प्रारंभ होता है, 'आआगे जब तुम ओ साजना/अंगना फूल खिलेंगे।' 
अंत और अलविदा के प्रसंग में इन बोलों का क्‍या मतलब? क्‍या कुछ अभी शेष है, जिसे इंगित किया जा रहा, जिसके अभी घटित होने का संकेत है? क्‍या कोई ऐसा धागा है, जो नज़र नहीं आता, लेकिन आदित्‍य और गीत को आपस में जोड़े हुए है, और जब वे एक-दूसरे की ओर पीठ करके दो भिन्‍न दिशाओं में चल देंगे, तो और कुछ नहीं होगा, सिवाय इसके कि वह धागा और खिंचेगा, ख़लिश और कशिश और बढ़ेगी, सांसों की गिरह ज़रा और उलझकर रह जाएगी।
 
इस गाने के फ़लसफ़े की यही मुख्‍़तलिफ़ पोजिशन है कि वस्‍तुत: यह एक स्‍थगन का गीत है। कि यह अपनी इतनी साफ़ सच्‍चाई को बेदख़ल कर अपनी ज़मीन आने वाले कल के किसी सपने में तलाशता है। कि इसमें आदित्‍य और गीत का अंत:स्‍तल स्‍थगित है। यह 'सस्‍पेंशन' उनके प्रेम के 'रियलाइज़ेशन' का, प्रकटन का एक हेतु है, 'एक्‍सक्‍यूज़' है। एक 'मेटाफ़ोरिक बायपास' है, जिससे होकर उन्‍हें गुज़रना होगा, लंबी दूरियां तय करना होंगी, और आखिरकार वहीं पहुंचना होगा, जहां वे पहले ही पहुंच चुके थे, दुनिया के उस आखिरी छोर पर, एक-दूसरे को अलविदा कहते, और इसके बावजूद एक-दूसरे की नियति का अनिवार्यत: आत्‍मीय प्रसंग बनते।
 
प्रेम के साम्राज्‍य का एक बड़ा इलाक़ा स्‍थगन के जनपद में पड़ता है। और उसका इतना ही एक और बड़ा इलाक़ा स्‍मृति के जनपद में पड़ता है। प्रेम बहुधा अतीत में या आगत में घटित होता है। 'रिकलेक्‍शन' में, या 'एंटिसिपेशन' में। स्‍मृति में, या कल्‍पना में। और प्रेम में जो भी मौजूदा पल में घटित होता है, वह महज़ एक बेलौस और बनैली-सी लय होती है, जिसमें चीज़ें अपनी ऐंठ से खुलती रहती हैं, सूत की रस्सियों की तरह, रक्‍त में खुलती-मुंदती खिड़कियों के भीतर। लेकिन आखिरकार वह एक बेनिशान लम्‍हा होता है, जो कि महज़ बीत रहा होता है।
 
जबकि, प्रेम में उसको पुकारने का गौरव है, जो बीत चुका। प्रेम में उसकी प्रतीक्षा का रोमांच है, औत्‍सुक्‍य है, जो अभी घटित होना है। फिल्‍म 'जब वी मेट' का यह गीत एक पुकारती हुई प्रतीक्षा है और वह एक प्रतीक्षा करती पुकार भी है। यह गीत एक ऐसे ठहरे हुए पठार पर घटित होता है, जिसमें अभी कहीं नहीं है, यह लम्‍हा कहीं नहीं है, और तमाम 'फूल', तमाम 'सावन', तमाम 'भरी बरसातें', तमाम 'झिलमिल तारे', सांसों की 'मद्धम लय' और सपनों का समूचा 'जहां' अभी अपने स्‍थगन के भव्‍य एकांत में ठहरे हुए हैं, थमे हुए हैं, जैसे बर्फ के रेगिस्‍तान के नीचे एक पूरे का पूरा शहर धंसा हुआ होता है, अपनी धूप और बहार का इंतज़ार करता हुआ।

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