चाँदनी की रश्मियों से चित्रित छायाएँ

बस इतनी ही है कहानी

अचेतन की आकृतियाँ

मेरी आँखों में ठहरी हुई तुम

मनुष्य की सोच में ब्रह्मांड आ गया

सब कुछ अपरिचय से घिरा है

जीवन से बड़ी नहीं हो सकती है रचना

इस बार नहीं गाऊँगा गीत पीड़ा भुला देने वाले

खिड़की खुलती है पर कोई झाँकता नहीं

बारिश में भीगते पेड़ के साथ

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