इस व्यापार युद्ध से नष्ट हो सकती है दुनिया

दुनिया में व्यापार युद्ध छिड़ गया है। स्थिति कितनी गंभीर हो रही है, इसका अनुमान इसी से लगाइए कि अमेरिका और चीन के बीच आयात शुल्कों से आरंभ यह युद्ध अब भारत, यूरोपीय संघ, तुर्की, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान और मैक्सिको तक विस्तारित हो गया है। इसमें दुनियाभर के केंद्रीय बैंक एवं प्रमुख संस्थाएं भारी आर्थिक मंदी के खतरे की भविष्यवाणी कर रही हैं।
 
अमेरिका के फेडरल रिजर्व, यूरोपीयन सेंट्रल बैंक, जापान, ऑस्ट्रेलिया, इंगलैंड के बैंक प्रमुखों ने कहा है कि पूरी स्थिति वैश्विक व्यापार युद्ध की शक्ल अख्तियार कर रहा है। इनके अनुसार यदि इनको रोका नहीं गया, तो यह 2008 से भी भयानक मंदी पैदा कर सकता है। यह मानने में तो कोई हर्ज ही नहीं है कि एक-दूसरे के सामानों की आवाजाही को शुल्कों से बाधित करने के कारण व्यापारिक माहौल बिगड़ेगा। इसके दुष्परिणाम बहुआयामी होंगे जिनमें विकास दर में गिरावट शामिल है।
 
वास्तव में 'अमेरिका फर्स्ट' का नारा देने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संरक्षणवादी नीतियों और व्यापार शुल्क को हथियार के तौर पर जिस तरह उपयोग करना आरंभ किया है, उसका परिणाम यही होना है। अमेरिका ने पिछले सप्ताह चीन के 50 अरब डॉलर के सामानों पर 25 प्रतिशत शुल्क लगा दिया था। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका के 50 अरब डॉलर के 659 उत्पादों पर शुल्क लगा दिया।
 
ट्रंप ने चीन को परोक्ष रूप से धमकी दी थी कि अमेरिका 200 अरब डॉलर के अतिरिक्त चीनी सामानों पर शुल्क लगाएगा। चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा कि ऐसा हुआ तो चीन भी इसके जवाब में कदम उठाएगा। ट्रंप के रवैये को देखते हुए चीन से आयात किए जाने वाले 450 अरब डॉलर के उत्पादों पर शुल्क लगाए जाने की आशंकाएं बढ़ गई हैं। चीन ने कहा है कि यह अमेरिका का ब्लैकमेलिंग है एवं उसे इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।
 
चीन के विषय में आगे चर्चा करने तथा अन्य देशों का उल्लेख करने से पहले भारत पर आते हैं। अमेरिका ने मार्च महीने में भारत से आयातित इस्पात पर 25 प्रतिशत और एल्युमीनियम पर 10 प्रतिशत शुल्क लगा दिया था। इसके जवाब में अब भारत ने अमेरिका से आने वाली 29 वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया। मटर और बंगाली चने पर शुल्क बढ़ाकर 60 प्रतिशत, मसूर दाल पर 30 प्रतिशत, बोरिक एसिड पर 7.5 प्रतिशत, घरेलू रीजेंट पर 10 प्रतिशत, आर्टेमिया (एक प्रकार की झींगा मछली) पर 15 प्रतिशत कर दिया गया है। इनके अलावा चुनिंदा किस्म के नटों, लोहा एवं इस्पात उत्पादों, सेब, नाशपाती, स्टेनलेस स्टील के चपटे उत्पाद, मिश्र धातु इस्पात, ट्यूब-पाइप फिटिंग, स्क्रू, बोल्ट और रिवेट पर शुल्क बढ़ाया गया है।
 
हालांकि अमेरिका से आयातित मोटरसाइकलों पर शुल्क नहीं बढ़ाया गया है। इसके पहले 17 जून को जो फैसला किया गया था उसके मुताबिक अमेरिका से आयात होने वाली 800 सीसी से ज्यादा की मोटरसाइकलों पर 50 प्रतिशत शुल्क लगेगा, बादाम पर 20 प्रतिशत, मूंगफली पर 20 प्रतिशत और सेबों पर भी 25 प्रतिशत। भारत बातचीत के जरिए मसले को सुलझाना चाहता था। जून के दूसरे सप्ताह में वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु अमेरिका दौरे पर गए थे। प्रभु की अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस और अमेरिका के व्यापार प्रतिनिधि रॉबर्ट लाइटहाइजर के साथ हुई बैठकों के दौरान विवाद को बातचीत से सुलझाने का निर्णय करने की घोषणा की गई थी।
 
इसके पूर्व मई में भारत ने विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान में भी मामला दायर किया, हालांकि मामला दायर करने के बावजूद भारत का मत यही था कि हम पहले बातचीत करेंगे और नहीं सुलझा तो विवाद निपटान इकाई से इसका निर्णय देने के लिए कहेंगे। लेकिन डोनाल्ड ट्रंप ने कनाडा के क्यूबेक में आयोजित जी-7 के बैठक में भारत समेत दुनियाभर की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं पर तीखा हमला किया। भारत पर कुछ अमेरिकी उत्पादों पर 100 प्रतिशत का शुल्क लगाने का आरोप लगाया। उसके बाद भारत ने यह कदम उठाया।
 
वास्तव में क्यूबेक के भाषण में ट्रंप ने पूरी दुनिया को निशाना बनाते हुए अपने रवैये पर कायम रहने का सीधा संदेश दिया था। उन्होंने भारत सहित दुनिया की कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर अमेरिका को व्यापार में लूटने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारत कुछ अमेरिकी उत्पादों पर 100 प्रतिशत शुल्क वसूल रहा है। हम तो ऐसे गुल्लक हैं जिसे हर कोई लूट रहा है। ट्रंप ने कहा कि हम भारत में विशेष रूप से हार्ले डेविडसन मोटरसाइकलों पर ऊंचा शुल्क लगाए जाने का मुद्दा कई बार उठा चुके हैं। हम अमेरिका को आने वालीं भारतीय मोटरसाइकलों पर आयात शुल्क बढ़ाने की चेतावनी दे चुके हैं।
 
ट्रंप ने सम्मेलन के संयुक्त घोषणा पत्र के पाठ को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि हम सभी देशों से बात कर रहे हैं। यह रुकेगा या फिर हम उनसे कारोबार करना बंद करेंगे। जी-7 के नेताओं ने उन्हें मनाने की पूरी कोशिश की लेकिन वे असफल रहे। उसके बाद सबको कुछ न कुछ जवाबी कदम उठाना था। भारत ने संकेत समझ लिया इसलिए उसने प्रतीक्षा नहीं की।
 
यूरोपीय संघ ने अमेरिका के बोर्बोन, जीन्स, व्हिस्की, चावल और मोटरसाइकल सहित कई उत्पादों पर 3.3 अरब डॉलर का शुल्क लगाया है। अमेरिका ने वहां के इस्पात एवं एल्युमीनियम पर 25 प्रतिशत और 10 प्रतिशत शुल्क लगाने की घोषणा कर दी है। ट्रंप ने कहा है कि इस शुल्क को यूरोपीय संघ हटाए अन्यथा हम वहां से आने वाली कारों पर हम 20 प्रतिशत शुल्क लगाएंगे। जापान की कारों व कई सामग्रियों पर भी उन्होंने शुल्क लगाने की चेतावनी दे दी है। तुर्की ने भी अमेरिका से आयातित वस्तुओं पर 267 मिलियन डॉलर मूल्य का आयात शुल्क लगाने की घोषणा कर दी है।
 
तत्काल शुल्क बनाम प्रतिशुल्क का यह वार रुकने की स्थिति में नहीं है। आगे कुछ भी हो सकता है, जैसे चीन कई तरीकों से बदला ले सकता है। आईफोन एक्स, एक्सेल कार, स्टारबक्स और टॉम क्रूज की फिल्मों आदि की मांग चीन में है। इन सब पर चीन प्रतिबंध लगा सकता है, उत्तर कोरिया के साथ अमेरिका के कूटनीतिक संबंध कायम करवाने के अपने प्रयास को रोक सकता है। चीन ने पिछले महीने कहा था कि उसने अमेरिका से आयातित पोर्क और ऑटोमोबाइल्स की जांच शुरू कर दी है जिसके बाद ये उत्पाद बंदरगाहों पर ही रहे। चीन और अमेरिका दुनिया की दो अर्थव्यवस्थाएं हैं। इस व्यापार युद्ध ने वैश्विक कंपनियों के बीच भरोसे को घटाया है और वैश्विक अर्थव्यवस्था खतरे की ओर जा रही है।
 
ऑटोमोबाइल कंपनियां इसका शिकार होते दिख रही हैं। मर्सीडीज बेंज बनाने वाली जर्मनी की ऑटोमोबाइल कंपनी डेमलर एजी ने 2018 के अपने लाभ के पूर्वानुमान को घटा दिया है। जनरल मोटर्स और फोर्ड के शेयर जहां 1 प्रतिशत गिरे हैं, वहीं टेस्ला के शेयरों में भी 0.5 प्रतिशत की गिरावट हुई है। बीएमडब्ल्यू ने भी कहा है कि इसकी वजह से उसे रणनीतिक उपायों की तलाश करनी पड़ रही है। डेमलर एजी ने कहा है कि उसकी कारों पर चीन द्वारा आयात शुल्क बढ़ा देने से चीन के ग्राहकों की मांग में कमी आएगी। उसे इस साल कम फायदा होगा।
 
यह ठीक है कि अमेरिका भारी व्यापार घाटे में है और उसकी अर्थव्यवस्था भी घाटे की अर्थव्यवस्था बन गई है। किंतु वही एक समय दुनिया में खुले और मुक्त व्यापार का झंडाबरदार बना हुआ था। यही मुक्त व्यापार व्यवस्था उसके गले की हड्डी क्यों बन रही है? क्यों वह अपने ही मुक्त बाजार की विश्व व्यवस्था से पीछे हट रहा है? इस व्यवस्था में संरक्षणवादी और आयात शुल्कों का हमला कतई निदान नहीं हो सकता।
 
व्यापार आगे बढ़ते हुए कई प्रकार के अन्य तनावों में परिणत हो सकता है। इससे दुनिया को बचाना जरूरी है। आज यह प्रश्न उठाने की आवश्यकता है कि क्या यह तथाकथित बाजार पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का स्वाभाविक संकट है? क्या इसका निदान इस व्यवस्था में है या हमें किसी वैकल्पिक व्यवस्था की तलाश करनी होगी जिसमें देशों की एक-दूसरे के आयातों और निर्यातों पर निर्भरता कम हो सके?
 
 

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