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जी-20 सम्मेलन में भारत के कई हितों का संवर्धन

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शरद सिंगी

, रविवार, 9 दिसंबर 2018 (00:17 IST)
विश्व के शक्तिशाली और शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं वाले 20 देशों के समूह-20 (G-20) का शिखर सम्मेलन अर्जेंटी‍ना की राजधानी ब्यूनस आयर्स में 30 नवंबर और 1 दिसंबर को हुआ। प्रधानमंत्री मोदी सहित अमेरिका, रूस, जापान, चीन आदि देशों के शीर्ष नेताओं ने इस सम्मेलन में भाग लिया।

यह सम्मेलन इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण था कि इस समय दुनिया के अधिकांश देश एक-दूसरे के साथ अपने संबंधों को पुन: परिभाषित करने में लगे हैं।
 
चीन, अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों और रूस, अमेरिका के साथ राजनीतिक संबधों को लेकर तनाव में है। रूस की यूक्रेन को लेकर यूरोपीय देशों के साथ लगातार ठनी हुई है। सऊदी अरब, पत्रकार खगोशी की हत्या के मामले में पिछले दिनों सुर्खियों में था और यूरोपीय देशों का उस पर दबाव था।

ऐसे ही अनेक मामले हैं जिनकी वजह से विभिन्न देशों के बीच गंभीर मतभेद हैं और संबंधों के तार उलझ चुके हैं। ऐसे समय में सम्मेलन से कुछ सार्थक परिणाम निकलने की तो उम्मीद भी नहीं थी।
 
इस पृष्ठभूमि का संज्ञान लेते हुए मेजबान देश अर्जेंटीना के राष्ट्रपति मॉरीसिओ ने सम्मेलन के अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि 'बहुत से लोग इन शिखर सम्मेलनों की उपयोगिता के बारे में संदेह करते हैं और पूछते हैं कि ये किन लोगों का भला करते हैं?

दुनिया को यह दिखाना हमारा कर्तव्य है कि आज की वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए वैश्विक सामंजस्य आवश्यक है।' जाहिर है इन सम्मेलनों के परिणामों के बारे में हम ही नहीं, दुनिया के सभी लोगों के मन में प्रश्न हैं और विश्व के नेताओं को यह मालूम है।
 
सम्मेलन की शुरुआत ही खराब हुई, जब ट्रंप ने यूक्रेन के खिलाफ रूसी आक्रामकता का हवाला देते हुए सम्मेलन के दौरान रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ पूर्व निर्धारित बैठक रद्द कर दी। हम भली-भांति जानते हैं कि मीटिंग निरस्त करना विरोध जताने का एक तरीका होता हैं किंतु इन बड़ी शक्तियों के एक मेज पर आने और अपनी शिकायतें दूर करने का यही एक समय होता है। मीटिंग भी आप निरस्त कर रहे हैं और वह भी एक तीसरे देश के लिए? अत: इसे कूटनीतिक परिपक्वता नहीं माना जा सकता।
 
सच तो यह है कि दुनिया में प्रतिदिन किसी न किसी वजह से कोई देश दूसरे देश के साथ अन्याय कर रहा होता है और हर एक ऐसे कारण के लिए मीटिंग निरस्त नहीं की जा सकती। जब तक आपके साथ खुद कुछ नहीं हो रहा है, तब तक तो आपको एक परिपक्व महाशक्ति होने का परिचय देना होगा और न्याय के लिए दूसरे देश पर दबाव डालना होगा अन्यथा बात बंद करके कुछ हासिल नहीं होता है।
 
शिखर सम्मेलन में सकारात्मक हुआ केवल यही कि चीन के साथ बात करके ट्रंप ने चीनी उत्पादों पर अपने आयात शुल्क का दायरा बढ़ाने की घोषणा को थोड़ा स्थगित कर दिया जिससे वैश्विक बाजारों ने थोड़ी राहत की सांस ली। विश्व की शेष सारी गंभीर समस्याओं को भविष्य की ओर धकेल दिया गया। लगता था कि इस सम्मेलन के प्रति कोई नेता गंभीर नहीं था। विशेषकर ट्रंप के रुख को लेकर सभी देशों के नेताओं ने अपनी सक्रियता को कम कर दिया है, क्योंकि वे कब किस नेता और किस देश के बारे में क्या उगल देंगे, उन्हें खुद मालूम नहीं होता।
 
यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि मोदी इस नीरस सम्मेलन से भी भारत के लिए कुछ निकालने में सफल रहे। हम भारतीयों को हर्ष होगा कि उन्होंने अमेरिका और जापान के साथ तिकड़ी बनाने की घोषणा की। मोदी ने जोर देकर साझा समस्याओं पर साथ मिलकर काम जारी रखने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि 'जेएआई' (जापान, अमेरिका, भारत) की बैठक लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्पित है। इन तीनों देशों के प्रथमाक्षर 'जय' बनाते हैं जिसका अर्थ 'जीत' है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि यह बैठक 3 राष्ट्रों की दूरदृष्टि का समन्वय है। जापानी प्रधानमंत्री ने कहा कि वे प्रथम 'जेएआई' त्रिपक्षीय वार्ता में भाग लेकर खुश हैं।
 
डोनाल्ड ट्रंप ने बैठक में भारत के आर्थिक विकास की सराहना की। तीनों नेताओं ने संपर्क, सतत विकास, आतंकवाद निरोध और समुद्री एवं साइबर सुरक्षा जैसे वैश्विक एवं बहुपक्षीय हितों के सभी बड़े मुद्दों पर तीनों देशों के बीच सहयोग के महत्व पर जोर दिया।

चीन की दादागिरी को ध्यान में रखते हुए तीनों ने हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय कानून एवं सभी मतभेदों के शांतिपूर्ण हल पर आधारित मुक्त, समग्र और नियम आधारित समुद्री क्षेत्र के उपयोग पर अपने विचार साझा किए।
 
मोदी, ट्रंप और आबे बहुपक्षीय सम्मेलनों में एक अलग से त्रिपक्षीय बैठक करने के लिए भी सहमत हुए। 3 देशों का इस तरह साथ आना भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता थी। सम्मेलन में एक और महत्वपूर्ण बात हुई, जब मोदी ने दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा को गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में भारत आमंत्रित किया।
 
यह भी उल्लेखनीय है कि सन् 2022 के लिए इस महासमूह की मेजबानी करने का अवसर भी मोदी ने हासिल किया, जो भारत की स्वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ वाला वर्ष रहेगा। यह मेजबानी हमारे लिए एक बड़े ही गौरव की बात होगी। इस तरह भारत लिए तो यह सम्मेलन कई दृष्टियों से उपयोगी ही रहा।

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