कितना सच है बहुसंख्यक भारतीयों के वेजीटेरियन होने का दावा?

गुरुवार, 5 अप्रैल 2018 (11:16 IST)
- सौतिक बिस्वास
 
भारत को लेकर सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी ये है कि यहां के ज़्यादातर लोग शाकाहारी हैं। लेकिन हक़ीकत इससे अलग है। इससे पहले 'सतही' अनुमान बताते रहे हैं कि एक-तिहाई से ज़्यादा भारतीय शाकाहारी खाना खाते हैं।
 
अगर आप सरकार द्वारा करवाए गए तीन बड़े सर्वे को आधार मानें तो 23% से 37% भारतीय शाकाहारी हैं। मगर ये आंकड़े ख़ुद में कुछ साबित नहीं करते। लेकिन अमेरिका में रहने वाले मानवविज्ञानी बालमुरली नटराजन और भारत में रहने वाले अर्थशास्त्री सूरज जैकब द्वारा किया गया रिसर्च बताता है कि "सांस्कृतिक और राजनीतिक दबाव" के कारण ऊपर दिए गए आंकड़े इतने ज़्यादा हैं।
 
यानी जो लोग वास्तव में मीट, विशेषकर बीफ़ खाते हैं, वे रिपोर्ट में शाकाहारी हैं। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ता कहते हैं कि वास्तव में 20 प्रतिशत भारतीय ही शाकाहारी हैं। यह संख्या अब तक की मान्यताओं और दावों से बहुत कम है।
 
भारत की आबादी के 80 फ़ीसदी हिंदू हैं और उनमें से ज़्यादातर मांस खाते हैं। एक तिहाई अगड़ी जातियों के संपन्न लोग ही शाकाहारी हैं। सरकारी आंकड़े दिखाते हैं कि जो लोग शाकाहारी हैं, उनकी आय ज़्यादा है और वे मांस खाने वालों से ज़्यादा संपन्न भी हैं। तथाकथित छोटी जातियों से संबंध रखने वाले दलित और जनजातियों के लोग मुख्यत: मांसाहारी हैं।
 
भारत के शाकाहारी शहर
इंदौर: 49%
मेरठ: 36%
दिल्ली: 30%
नागपुर: 22%
मुंबई: 18%
हैदराबाद: 11%
चेन्नई: 6%
कोलकाता: 4%
 
(शाकाहारियों की औसत संख्या। स्रोत: नैशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे)
 
वहीं दूसरी तरफ़ डॉक्टर नटराजन और डॉक्टर जैकब ने पाया कि अवधारणाओं और दावों के उलट बीफ़ खाने वालों की संख्या काफ़ी ज़्यादा है।
 
बीफ़ खाने वाले भारतीय
भारत सरकार कहती है कि कम से कम 17 फ़ीसदी भारतीय बीफ़ खाते हैं। मगर यह साबित किया जा सकता है कि सरकारी आंकड़े ज़मीनी हक़ीक़त से अलग हैं क्योंकि भारत में बीफ़ सांस्कृतिक, राजनीतिक और सामूहिक पहचान के संघर्ष में फंसा हुआ है।
 
नरेंद्र मोदी की सत्ताधारी हिंदू राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी शाहाकार का प्रमोशन करती है और मानती है कि गायों की रक्षा होनी चाहिए क्योंकि देश की बहुसंख्यक आबादी उन्हें पवित्र मानती है। एक दर्जन से ज़्यादा राज्यों ने गोवंश को मारने पर प्रतिबंध लगा दिया है। मोदी के राज्य में गोरक्षक समूह खुलेआम काम कर रहे हैं। ऐसे समूहों ने पशुओं को ले जा रहे लोगों की हत्या भी की है।
 
सच यह है कि लाखों भारतीय जिनमें दलित हिंदू, मुसलमान और ईसाई भी शामिल हैं, बीफ़ खाते हैं। उदाहरण के लिए केरल में 70 समुदाय बकरी के महंगे मीट की जगह बीफ़ खाना पसंद करते हैं।
 
डॉक्टर नटरादन और डॉक्टर जैकब ने पाया कि असल में लगभग 15 फीसदी भारतीय या फिर 18 करोड़ लोग बीफ़ खाते हैं। यह संख्या सरकारी आंकड़ों से 96 प्रतिशत ज़्यादा है। और फिर भारतीय खान-पान को लेकर भी कुछ धारणाएं बनी हुई हैं।
 
दिल्ली के सिर्फ़ एक तिहाई बाशिंदे ही शाकाहारी माने जाते हैं। ये शहर ख़ुद को मिले 'भारत की बटर चिकन की राजधानी' के तमगे के अनुकूल भी है। लेकिन चेन्नई को लेकर जो धारणा है कि यह 'दक्षिण भारतीय शाकाहारी भोजन' का गढ़ है- एकदम भ्रामक है। कारण- एक सर्वे बताता है कि शहर के सिर्फ़ 6% निवासी शाकाहारी हैं।
 
बहुत से लोग मानते हैं कि पंजाब 'चिकन पसंद करने वाला' राज्य है। मगर हक़ीक़त यह है कि इस उत्तरी राज्य के 75 प्रतिशत लोग शाकाहारी हैं।
 
खानपान को लेकर ग़लतफ़हमी
तो यह ग़लतफ़हमी कैसे फैल गई कि भारत मुख्यत: शाकाहारियों का देश है?
 
डॉक्टर नटराजन और डॉक्टर जैकब ने मुझे बताया, "खानपान के मामले में भारत के समाज में बहुत विविधता है। यहां कुछ ही किलोमीटर की दूरी में और सामाजिक समूहों में व्यंजन अलग हो जाते हैं। ऐसे में आबादी के बड़े हिस्से के खानपान को लेकर अवधारणा इस बात से बनती है कि उस हिस्से की तरफ़ से कौन बात रख रहा है।
 
वह कहते हैं, "प्रभावशाली लोग जो खाना खाते हैं, समझ लिया जाता है कि जनता वही खाती है।"
 
"इस मामले को नॉन-वेजीटेरियन शब्द से समझा जा सकता है। यह शाकाहारी लोगों की सामाजिक ताकत को दिखाता है कि वे कैसे खाने का वर्गीकरण कर सकते हैं, कैसे उनका क्रम तय कर सकते हैं, जिसमें शाकाहारी यानी वेजीटेरियन खाने का स्थान मांस से ऊपर है।" यह ठीक वैसा ही है, जैसे कि "व्हाइट" लोगों ने अपने विभिन्न उपनिवेशों के लोगों के लिए 'नॉन-व्हाइट' शब्द गढ़ा था।
 
पलायन
शोधकर्ता कहते हैं कि पलायन के कारण भी कुछ धारणाएं बनती हैं। तो जब दक्षिण भारतीय उत्तर या मध्य भारत में आए तो उनका खाना पूरे दक्षिण भारत का खाना समझा गया। इसी तरह से उत्तर भारतीयों के साथ हुआ, जब वे देश के अन्य हिस्सों में गए।
 
कुछ धारणाओं को बाहरी लोग भी बनाते हैं। उत्तर भारतीय लोग चंद दक्षिण भारतीयों से मिलकर अवधारणा बना लेते हैं, यह नहीं सोचते कि दक्षिण भारत कितना विविधता भरा क्षेत्र है। ऐसा ही दक्षिण भारतीयों के साथ भी होता है।
 
शोधकर्ताओं के मुताबिक, विदेशी मीडिया भी ग़लत करता है। वह कुछ बातों के आधार पर ही समाजों की पहचान करता है। अध्ययन से महिलाओं और पुरुषों के खान-पान की आदतों का भी पता चलता है। उदाहरण के लिए पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा महिलाएं कहती हैं कि वे शाकाहारी हैं।
 
रिसर्चर कहते हैं कि इसे ऐसे समझा जा सकता है कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज़्यादा मौकों पर आज़ादी से घर के बाहर खाते हैं। हालांकि बाहर खाने का मतलब यह नहीं है कि मांस ही खाया जा रहा हो।
 
मांसाहार और जेंडर
पितृसत्ता और राजनीति का भी इसमें योगदान हो सकता है। डॉक्टर नटराजन और डॉक्टर जैकब कहते हैं, "शाकाहार की परंपरा को बनाए रखने का बोझ अन्यायपूर्ण ढंग से महिलाओं पर आ जाता है।"
 
सर्वे में शामिल लगभग 65 प्रतिशत घरों में रहने वाले जोड़े मांसाहारी पाए गए और शाकाहारी सिर्फ़ 20 प्रतिशत थे। मगर 12 प्रतिशत मामलों में पति मीट खाता है और पत्नी शाकाहारी है। सिर्फ़ तीन प्रतिशत मामलों में पत्नी मांसाहारी थी और पति शाकाहारी।
 
इसका मतलब साफ़ है। ज़्यादा भारतीय किसी न किसी रूप में मांस खाते हैं, भले ही रोज़ खाते हों या कभी-कभी। जैसे कि चिकन या मटन। शाकाहारी लोग ज़्यादा संख्या में नहीं हैं।
 
तो भारत में ऐसा क्यों है कि शाकाहार का प्रभाव ज़्यादा है और पूरी दुनिया में यही भारत और भारतीयों की पहचान है? क्या इसका खानपान की आज़ादी पर 'पहरे' से कोई संबंध है जिसके कारण जटिल और बहुसांस्कृतिक समाज में खाने को लेकर धारणाएं बन रही हैं?

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