क्या ये अमेरिका की पाकिस्तान को आख़िरी चेतावनी है?

बुधवार, 6 दिसंबर 2017 (11:16 IST)
अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सीआईए) के डायरेक्टर माइक पोम्पेयो ने कहा है कि अगर पाकिस्तान अपने देश में चरमपंथ की सुरक्षित पनाहगाहों पर कार्रवाई नहीं करेगा तो अमेरिका इस समस्या से अपने तरीक़े से निपटेगा। पोम्पेयो का बयान अमरीकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस के पाकिस्तान दौरे के ठीक पहले आया।
 
अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस पोम्पेयो के इस बयान के बाद सोमवार को पाकिस्तान पहुंचे और प्रधानमंत्री शाहिद ख़ाकान अब्बासी और सेना प्रमुख क़मर जावेद बाजवा से मुलाक़ात कर अमेरिका की चिंता से उन्हें अवगत कराया। बीबीसी संवाददाता अमरेश द्विवेद्वी ने अमेरिका की डेलावेयर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मुक्तदर ख़ान से इस बारे में बात की। पढ़ें बातचीत के अंश।
 
अमेरिका कार्रवाई करेगा?
पिछले 20 साल से अमेरिका पाकिस्तान को संभाल नहीं पाया है। उसकी वजह ये है कि पाकिस्तान में दिक्क़त बनी हुई है। अफ़ग़ानिस्तान के चरमपंथी कार्रवाई करके पाकिस्तान में चले जाते हैं। वहां अलक़ायदा भी एक समय में काफ़ी मजबूत था और यूरोपीय और अमेरिकी चरमपंथी वहां जाकर ट्रेनिंग हासिल करते थे। लेकिन लंबे समय से पाकिस्तान, अमेरिका की समस्या और हल दोनों बना हुआ है। अमेरिका लगातार चाह रहा है कि पाकिस्तान अपने यहां चरमपंथ के सुरक्षित पनाहगाहों को ख़त्म करे।
 
2011 में जब अमेरिका ने पाकिस्तान पर दबाव बढ़ा दिया था तो पाकिस्तान ने अफ़ग़ानिस्तान को जाने वाली अमेरिकी सेना की आपूर्ति को ठप कर दिया था। इस तरह वो अमेरिका के साथ असहयोग भी करता रहा है। अभी कुछ दिन पहले ही जमात उद दावा के मुखिया हाफ़िज सईद को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया, जिन पर अमेरिका ने दो करोड़ डॉलर का इनाम रखा हुआ है।
 
लेकिन इस बार ट्रंप प्रशासन ने थोड़ा सख़्त संदेश दिया है। अमेरिकी रक्षा मंत्री जनरल मैटिस ने खुद पाकिस्तान जाकर उससे बहुत विनम्रता से कहा है कि वो चरमपंथ के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई करे। हालांकि पिछले कुछ सालों में पाकिस्तान के फ़ाटा इलाक़े में इन सुरक्षित पनाहगाहों को ड्रोन के ज़रिए अमेरिका ने निशाना बनाया है। अभी जो पाम्पेयो कह रहे हैं उसका मतलब ये है कि अमेरिकी अब पाकिस्तान में चाहे वो कराची, लाहौर, इस्लामाबाद या रावलपिंडी हो, कहीं भी ऐसी कार्रवाई कर सकता है। ये साफ़ संदेश है कि 'या तो कार्रवाई करिए या हम आपकी संप्रभुता को तवज्जो नहीं देंगे।'
 
अमेरिका ने अभी क्यों बढ़या दबाव?
ट्रंप प्रशासन के काम करने की शैली थोड़ी अलग है। अमेरिका के राजनीतिक पदाधिकारी ट्रंप की तरह ही बात करते हैं। पोम्पेयो ने तो सख़्त संदेश दिया, लेकिन जनरल मैटिस और अन्य अमरीकी जनरलों की भाषा नरम बनी हुई है। मैटिस ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख और अन्य महत्वपूर्ण लोगों से मिलकर कार्रवाई के लिए कहा है।
 
अमेरिका पाकिस्तान में चरमपंथ के सुरक्षित पनाहगाहों पर सैटेलाइट से लगातार नज़र रखता रहा है। उसने विशेष तौर पर इसी काम के लिए विशेष सैटेलाइट लगा रखे हैं। अमरीका का कहना है कि ये पनाहगाहें वैसी की वैसी बनी हुई हैं। हालांकि, दबाव के चलते चरमपंथी घटनाएं चाहे पाकिस्तान में हों या अफ़ग़ानिस्तान में, थोड़ी कम हो गई हैं।
 
पाकिस्तान की दिक्क़त ये है कि देश के अंदर देवबंदी, जिनका सऊदी अरब के वहाबी पंथ से ताल्लुक है, वही चरमपंथ में शामिल होते थे। लेकिन हाल के दिनों में बरेलवी पंथ भी धार्मिक कट्टरता की ओर बढ़ा है और अभी हाल ही में कई शहरों में उन्होंने तीखा विरोध प्रदर्शन भी किया है। ये तबका शांतिपूर्ण माना जाता था। लेकिन अब पाकिस्तान में पहले से अधिक धार्मिक कट्टरता आई है।
 
अमेरिका की सबसे बड़ी परेशानी अफ़ग़ानिस्तान है जहां वो पिछले 16 साल से तालिबान को नहीं हरा सका है। ये एक बहुत बड़ा भार बन गया है। वो चाहता है कि वो जल्द से जल्द तालिबान को हराए और अफ़ग़ानिस्तान में शांति के बाद वो पूरी तरह इलाक़े को छोड़ दे। ओबामा प्रशासन भी ऐसा ही चाहता था। लेकिन ऐसा तब तक नहीं हो सकता जबतक पाकिस्तान सहयोग न करे।
 
अमेरिका के पास क्या हैं विकल्प?
पाकिस्तान को अमेरिका हर साल दो अरब डॉलर की मदद देता है, हालांकि इसमें क़रीब डेढ़ अरब डॉलर की क्रेडिट अमेरिकी हथियारों को ख़रीदने के लिए होती है। ये डेढ़ अरब के हथियार चरमपंथ को ख़त्म करने की बजाय भारत को संतुलित करने के लिए ख़रीदे जाते हैं।
मुश्किल ये है कि अगर अमेरिका मदद देना बंद कर देगा तो उसकी जगह चीन ले लेगा और अमरीका के पास जो थोड़ा बहुत अधिकार है वो भी ख़त्म हो जाएगा।
 
ऐबटाबाद में ओसामा बिन लादेन पर जो कार्रवाई की थी उसे छोड़कर अमेरिका ने अपनी सैन्य कार्रवाई या ड्रोन हमले की कार्रवाई को सिर्फ फ़ाटा इलाक़े में ही केंद्रित कर रखा था। लेकिन अब वो जो कह रहा है उसका मतलब है अमेरिकी कार्रवाई का दायरा पूरे पाकिस्तान में बढ़ेगा। उनकी नज़र में तो इस्लाबाद की लाल मस्जिद भी एक पनाहगाह है, लेकिन क्या वो उस पर निशाना साधेंगे?
 
इसी तरह देश भर में फैले मदरसों पर कार्रवाई करना सबसे बड़ा सवाल है। जेम्स मैटिस अपनी इस यात्रा में पाकिस्तान को कार्रवाई करने की एक सूची देकर आए होंगे। इसलिए भी मैटिस की यात्रा अमरीका और पाकिस्तान के बीच संबंधों में एक नया मोड़ साबित हो सकती है क्योंकि वो ठोस कार्रवाई चाहेंगे।
 
भारत की स्थिति
पाकिस्तान अमेरिका के लिए धीरे-धीरे समस्या बनता जा रहा है और भारत अमेरिका के साथ सहयोग के लिए इसे एक मौके की तरह देख रहा है। अमेरिका चाह रहा है कि जल्द से जल्द अफ़ग़ानिस्तान का मुद्दा सुलझे और वो आगे बढ़े। आने वाले समय में शीत युद्ध के दौरान वाली प्रतिद्वंद्विता अब चीन के ख़िलाफ़ दिखने की संभावना है।
 
ऐसे में अमेरिका की कोशिश होगी कि वो चीन विरोधी गठबंधन में ऑस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया के साथ भारत को भी शामिल करे। संभावना भी ऐसी ही है कि जैसे ही अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में चरमपंथ की समस्या ख़त्म होती है, अमेरिका की पाकिस्तान पर निर्भरता भी ख़त्म हो जाएगी और वो भारत के साथ अपने रिश्ते मज़बूत करेगा।

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