देवेन्द्र सोनी

दीपावली का पर्व ज्यों-ज्यों पास आ रहा था, शोभा के चेहरे की आभा अपनी कांति खोती जा रही थी जिसे वह चाहकर भी छुपा नहीं पाती...
'नवरात्रि पर्व' के चलते ग्रामीण अंचल के कुछ व्यक्तियों से रमेश की मुलाकात हुई। वे 'कहीं' सलाह लेने आए थे। मुखिया थे किसी...
जितनी जरूरी है जीवन में हमारे नदी की मिठास उतना ही जरूरी है समुद्र-सा खारापन भी।
तनाव वास्तव में एक स्वभावगत समस्या है जो हमारे आत्मबल की कमी से उत्तपन होता है और फिर धीरे धीरे अवसाद की ओर ले जाता है।...
घर के कामकाज से निपटकर सुनीता थोड़ा आराम करने के लिए लेटी ही थी कि तभी उसके मोबाइल की घंटी बजी। सुनीता ने फोन उठाकर देखा...
अपने पिता का अंतिम संस्कार कर लौट रहे सिद्धार्थ की आंखों से अविरल धारा बह रही थी। वह अपने साथ वापस हो रही भीड़ के आगे-आगे...
वर्तमान में मुझे विवाह की परिभाषा बदलती हुई नजर आ रही है। अब विवाह का अर्थ वि + वाह! पर आधारित हो गया है अर्थात विवाह वही...
हमेशा की तरह ही, त्रस्त हैं लोग, सूखते रिश्तों से, आंखों के घटते पानी से और गिरते भू जल स्तर से।
आज 12वीं बोर्ड का परिणाम घोषित होने वाला था। घड़ी का कांटा जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, रमेश का दिल भी उसी तेजी से धड़क रहा था।...
सत्तर की उम्र पार कर रहे रमेश और उनकी पत्नी राधा अपनी बहू रमा की तारीफ करते नहीं अघाते। जब भी कभी उनसे मिलने कोई रिश्तेदार...
रंग, जीवन में हम, कृत्रिम रंगों का तो, आंनद लेते हैं बहुत। हर रंग का अपना -अपना होता है...
रमा के मौन व्रत का आज 7वां दिन था। उसने परिवार में सबसे बोलना बंद कर दिया था। दिनभर सबके काम करना और फिर चुपचाप अपने कमरे...
आसान नहीं है प्रेम पर लिखना प्रेम को समझना उसे जीना या फिर परिभाषित कर
संपन्न और शिक्षित परिवार में जब रमेश के यहां पहली पुत्री का जन्म हुआ तो पूरे कुटुम्ब में खुशी की लहर दौड़ गई। ऐसा नहीं...
मानव जीवन की सबसे बड़ी और अनदेखी पूंजी यदि कोई है, तो वह है हमारा स्वास्थ्य। 'अनदेखी' इसलिए कहा, क्योंकि हम जब तक हम बिस्तर...
रोज देखता हूं, निश्चित समय पर, उस अर्द्धविक्षिप्त अधेड़ महिला को जो निकलती है, मेरे घर के सामने से, कटोरा लिए हाथ में।
रमा कई दिनों से अपने पति सुरेश को बेचैन देख रही थी। दिन तो कामकाज में कट जाता, पर रात को उसे करवटें बदलते रहने का कारण...
परिदृश्य चाहे वैश्विक हो, राष्ट्रीय हो, सामाजिक हो या पारिवारिक हो- कुछ भी करने से पहले यह प्रश्न हमेशा सालता है कि लोग...
संगति का असर तो होता ही है। यह बात रमेश को उस समय समझ आई, जब 1 माह तक अपनी बुरी आदतों को छोड़कर वह सादगी से अपने कर्म में जुटा...
वर्तमान में बच्चों के भारी होते बस्तों से सभी त्रस्त हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा और सबसे आगे रहने की चाह में खुलकर कोई भी...
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